विज्ञान और अध्यात्म में बहुत गहरा सम्बन्ध है मनुष्य की समस्त जैविक शक्तियों को संचालित करने के लिए एनर्जी की जरुरत होती है जो भोजन से मिलती है और यही एनर्जी शरीर के विभिन्न अंगों के कुशल संचालन को जिम्मेदार होती है विज्ञान भी मानता है कि एनर्जी का प्रवंधन किसी भी कार्य को अद्वितीय रूप से करवाने में सक्षम है और अध्यात्म भी कहता है कि मन को एकाग्र करके शरीर के अंगों से अद्वितीय कार्य लिया जा सकता है अगर हम मन को एकाग्र करने को विज्ञान की भाषा में कहें तो यह ऊर्जा को एक विशिष्ट कार्य में प्रयोग करना ही है। शरीर स्वयं तय करता है कि किस अंग के संचालन के लिए कितनी ऊर्जा चाहिए।
वास्तव में इस श्रष्टि का आधार ऊर्जा है जो हर जीव जंतु और पदार्थ में किसी न किसी रूप में पायी जाती है यहाँ तक कि किसी पत्थर में भी उसकी स्थिति के कारण स्थितिज ऊर्जा होती है वहीं जो अनाज सूखा हमें मरा हुआ प्रतीत होता है उसकी ऊर्जा ही हमारे शरीर में जाकर हमें संचालित करती है। यही ऊर्जा जब किसी रेडियोएक्टिव पदार्थ में होती है तो परमाणु विस्फोट को जन्म देती है तो क्या इस ऊर्जा के रूप या उपयोग को नियंत्रित कर हम मन चाहे काम नहीं ले सकते हैं? और अगर हाँ तो क्या शरीर के अंदर की ऊर्जा को नियंत्रित कर हम अपने अंगों को मनचाहे कार्यों के लिए प्रयोग नहीं कर सकते हैं?
वास्तव में किसी इलेक्ट्रॉनिक सर्किट में एक वायर की मदद से एक समान ऊर्जा दी जाती हैं परन्तु उसके कम्पोनेंट अलग अलग ऊर्जा से संचालित होते हैं कोई 5 वोल्ट और कोई 12 वोल्ट लेता हैं और यह सब उसमें लगे कंट्रोलर और माइक्रो कंट्रोलर से संभव हैं जिसे हम अपने हिसाब से प्रोग्राम कर सकते हैं और वह हमारे अनुसार आउटपुट देता है। इसी तरह जब हम अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण स्थापित कर लेते है तो निश्चित ही उस इन्द्रिय द्वारा किये जाने वाले कार्यों को निर्देश देने में सक्षम हो जाते हैं और इस दशा में हम अपनी ऊर्जा का प्रवंधन करने में भी सक्षम हो जाते हैं आवेगों और बाहरी कार्यों का नियंत्रण आसान होता हैं और कुछ प्रयास के बाद ही हम अपनी भूख प्यास नींद क्रोध आदि पर काबू कर लेते हैं परन्तु आंतरिक अंगों के संचालन पर हमारा नियंत्रण नहीं होता हैं पर योग और अध्यात्म में यह सम्भव है कुंडलनी जागरण ऐसी ही एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें आंतरिक अंगों और ऊर्जा पर नियंत्रण स्थापित कर सकते हैं।
अभी भी मानव विज्ञान की खोज काफ़ी प्रारंभिक चरण में है मानव शरीर के रहस्यों की खोज के लिए विज्ञान की जगह अध्यात्म ज्यादा कारगर हैं क्योंकि इसकी प्रोग्रामिंग अभी भी सॉफ्टवेयर इंजीनियर नहीं कर पा रहे हैं।
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