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प्रकृति से छेड़छाड़

आज जंगल के किनारे बाले तालाब पर लगे बरगद के पेड़ पर उठने बाली भनभनाहट ने पेड़ के बाकी पक्षियों को परेशान कर दिया ।मामला अत्यंत गंभीर सा लग रहा था सो सभी कौतुहल बस मधुमक्खी के छत्ते की तरफ देख रहे थे छत्ते की सभी मधुमक्खियाँ अपने छत्ते से बाहर इकट्ठे होकर नारे बाजे कर रहीं थीं।......हमारी मांगे पूरी करो .......हम सब एक है........मधुमक्खी एकता जिंदाबाद.......      आवाज सुनकर रानी मक्खी तुरंत अपने घर से बाहर आ गयी उसने अपने जीवन में पहली बार ऐसा नजारा देखा था सो उसको समझ में नहीं आ रहा था कि समस्या क्या है और यह क्या हो रहा है और आखिर ये सब लोग कर क्या चाहते हैं           .......क्या समस्या है ....ये सब क्या हो रहा है......रानी मक्खी ने कड़ककर पूछा।सभी मधुमक्खी एक सुर में बोली आपकी मनमानी नहीं चलेगी.....हमारी मांगे पूरी करो।     रानी मक्खी इतनी सारी आवाज एक साथ सुनकर हैरान रह गयी और उसने चिल्लाकर कहा ......एक एक करके बोलो......सभी मक्खियाँ फिर चिल्लाने लगी ।क्रोधित रानी मक्खी ने आदेश दिया कि केवल एक मक्खी ही बात करेगी...कुछ देर के लिए स...

मुफ्तखोरी की आदत

हमारा देश मुफ्तखोरो का देश है क्यूंकि कई सौ सालों की गुलामी के बाद मुफ्तखोरी हमें आजादी के इनाम में मिली है ।पहले हम विदेशी शासकों के रहमोकरम पर जिन्दा थे अब सरकारी योजनाओं के रहमोकरम पर अपना पेट पाल रहे है और देश की आधे से अधिक आबादी मुफ्तखोरी के आनंद में मस्त है।बच्चे के पैदा होते ही उसकी माँ को सरकारी सहायता उपलब्ध करवाकर ये बता दिया जाता है कि जीवन की हर मुश्किल में भारत सरकार उसके साथ है।बच्चा 3साल का होते ही महिला बाल विकास मंत्रालय पंजीरी खिला खिला कर बच्चे को स्वस्थ्य बनाने में अपनी जिम्मेदारी को निभाकर बच्चे के माँ बाप को फील गुड करा देता है इसके बाद बच्चे को गोद लेने की जिम्मेदारी है प्राथमिक शिक्षा विभाग की ।बिना फीस भरे मुफ्त की किताबों और स्कालरशिप तथा मध्यान्ह  भोजन के सहारे बच्चा कब कक्षा 8 पास कर जाता है ये माँ बाप को पता ही नहीं चलता है ।माध्यमिक शिक्षा विभाग भी गरीब ग्रामीण बच्चों को उपकृत कर 12वी पास कराकर अपने कर्तव्य पूरे कर देता है अब बारी आती है वेरोजगारी भत्ते की जिसके सहारे 2-3 साल और आराम से कट जाते है तथा किशोर छात्र के छोटे मोटे शौक भी पूरे हो जाते है औ...

घास नुचवा

उस समय उनकी उम्र 59 साल की थी शरीर दुबला पतला पर गजब की फुर्ती वाला था वो जूनियर स्कूल में प्रधानाध्यापक थे और नाम था कामता प्रसाद ।मन बचन और कर्म से स्कूल को समर्पित या यूँ कहे कि स्कूल और शिक्षा उनकी आत्मा में बसती थी उनका विद्यालय सरकारी होने के बाबजूद इलाके के सबसे अच्छे स्कूल में गिना जाता था और क्यूँ ना गिना जाये सुबह से लेकर शाम तक वो अपना सारा काम जिम्मेदारी से पूरा करते थे ।बच्चो से उन्हें बहुत प्यार था इसलिए बच्चो की उपस्थिति भी शत प्रतिशत रहती थी  शिक्षा विभाग के कई बड़े अधिकारी उस स्कूल में आकर मास्टर साहब की तारीफ कर चुके थे ।मास्टर साहब अपने रिटायरमेंट के नजदीक पहुँच कर बड़ा सुकून महसूस करते थे और कहते थे कि अपना काम ईमानदारी से करो तो रात को नींद बहुत अच्छी आती है फिर अगर मैंने अच्छा किया होगा तो ऊपर वाला भी मेरे साथ अच्छा ही करेगा     सरकार शिक्षा के प्रति बहुत गंभीर थी इसलिए उसने गरीब बच्चो को अनिवार्य शिक्षा के लिए शिक्षा अधिकार अधिनियम कानून लागू कर दिया और शिक्षा विभाग के अधिकारी उस अधिनियम की शर्तो और निर्देशों का पालन करवाने के लिए लगातार विद्यालयो...

भारतीय लोकतंत्र

भारतीय लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण पद है आई. ए. एस ।पर इस पद को धारित करने वालो को आज तक ये पता नहीं है कि उन्हें भारत सरकार ने किस कार्य के लिए चयनित किया है एक जनपद में नियुक्त जिलाधिकारी जब तक ये पता कर पता है कि जनपद की भौगोलिक स्थिति क्या है जनपद की प्रशासनिक स्थिति क्या है जनपद की आवश्यकता क्या है और जनपद के लिए मास्टर प्लान बनाने के पहले ही उसका स्थानान्तरण अन्य जनपद में कर दिया जाता है और फिर वही क्रम चालू ।कभी सचिवालय, कभी निदेशालय, कभी जनपद के बीच रिटायरमेंट कब आ जाता है पता ही नहीं चलता है ।अगर कोई एक्टिव अधिकारी किसी महत्वपूर्ण योजना का निर्माण कर भी ले तो उसे क्रियान्वित करने का अवसर मिलना अशंभव है ऐसे में किसी विभाग में सुधार के लिए कोई अधिकारी प्रयास क्यूँ करें?जीवन में कम से कम 50-60 स्थानान्तरण के साथ नयी जगह सामजस्य तथा अपने बच्चो और परिवार की चिंता ही इस पद की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी रह जाती है ।शायद सरकार ने कभी यह कोशिश नहीं की कि विशेष विभाग या जनहित की महत्वपूर्ण योजनाओं के लिए पूर्णकालिक प्रशासनिक अफसरों को तैयार किया जाए और नियुक्ति कर योजनाओ के निर्माण और क्...

गंभीर समस्या

सरकारी स्कूल के बच्चो की शिक्षा के प्रति सरकारी नजरिया कुछ भी हो सरकारी आंकड़े कुछ भी कहें पर धरातल पर स्थिति कुछ और ही है ।प्रदेश स्तर के बतानुकुलित कमरों में बैठकर शिक्षा के बास्ताविक माहौल से अनभिज्ञ सरकारी अफसरों और मंत्रियो द्वारा ग्रामीण बच्चो के लिये बनायी गयी सरकारी योजनाए कागजोंपर ही सफलता के झंडे बुलंद कर रही है पर यथार्थ के धरातल पर स्थिति कुछ और ही है ।शहरी और निजी विद्यालयों की तरह शिक्षा देने के लिये बनाये गए सरकारी स्कूल ,आंकड़े जुटाने के कार्यालय और अध्यापक शासन की अनेको महत्वाकांक्षी योजनाओं को कार्यान्वित करवाने वाला कर्मचारी भर बनकर रह गया है ।शिक्षा अधिकार अधिनियम भले ही शिक्षक को अधिकार और बच्चो को सभी बुनियादी सुबिधायें देने की बकालत करता हो पर पर स्थिति अब भी वही है जहाँ पहले थी। सरकारी स्कूल केवल और केवल उन बच्चो के लिए हैं जो या तो पढना नहीं चाहते है या उनके माता पिता उन्हें पढ़ाना नहीं चाहते है ये स्कूल इन बच्चो के लिए मध्यान्ह भोजन ग्रहण करने की औपचारिकता मात्र है ।गंभीर आर्थिक संकट से जुझते इन बच्चो के लिए और इनके अभिभाबको के लिए दो जून की रोटी जुटाना प्रथम...

vyang "निरीक्षण"

ज ब भी मैं बाज़ार जाता तो मेरी निगाह अनायास उस ऑफिस की तरफ जरूर चलि जातीं, जिसे मैंने आज तक खुला नहीं देखा था।  पर आज जब मैं सुबह घर से निकला तो अजीब सा दृश्य था ।  ऑफिस न सिर्फ खुला था बल्कि उसमें कुछ लोग भी व्यस्त हो अपने काम में लगे हुए थे। मैं अपनी उत्सुकता रोक न सका और बाइक खड़ी करके ऑफिस में घुस गया,वहां पर कोई भी बात करने को तैयार नहीं था पर सभी परेशान से जरूर थे ।  मैंने एक सभ्य से दिखने वाले सज्जन से पूछा, "भाईसाहब क्या हो रहा है?"  उन्होंने झल्लाकर जबाब दिया, "दिखाई नहीं देता सफाई हो रही है । "  मैं चुप हो गया। कुछ पल बाद उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ तो प्यार से बॊले, "ऑफिस खुल रहा है । " "पर आज तक तो नहीं खुला" मैंने प्रश्न किया तो महाशय बॊले "आज तक ये समस्या भी तो नहीं आयी  थी । " मैंने पूछा कैसी समस्या तो बोले "तुम नहीं समझोगे । " मैंने कहा, " समझाओगे तो जरूर समझेंगे । " वो बॊले, "रात में फैक्स आया है, कि मंत्री जी सचिव साहब के साथ निरीक्षण पर आ रहे हैं ।  समय बहुत कम है और सारी व्यवस्था करनी है ...