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मन न मारिये लिखते रहिए

  कई बार आपका लिखा इसलिए नहीं छपता है क्योंकि आपके पद में बजन नहीं है, मसलन आप किसी निकाय के प्रमुख नहीं है या आपके पीछे विशेषज्ञ नहीं लिखा है। शिक्षा के क्षेत्र में लिखने और छपने के लिए आपके पास किसी डिग्री कॉलेज के प्राचार्य या प्रोफेसर या किसी शैक्षिक निकाय के मुखिया का पद होना बहुत महत्वपूर्ण है। इन पदों के धारण करने बाले लोगों का लिखा शिक्षा के लिए अत्यंत उपयोगी होगा ऐसा समाचार पत्र, पत्रिकाएं छापने बाले प्रकाशकों का मानना है। राजनीति में लिखने के लिए आपका राजनीतिक विश्लेषक होना ही पर्याप्त नहीं है इसके लिए आपका राजनीति में कोई पद होना आवश्यक है समाचार चैनल में राजनीतिक विश्लेषक होंने के चयन के क्या मानक हैं यह तो नहीं पता पर अगर एक बार किसी चैनल पर किसी जुगाड़ से आना शुरू हो गए तो सभी चैनल आपको आमंत्रण देना शुरू कर देंगे यह तय है। कृषि क्षेत्र, व्यापार, अर्थव्यवस्था, सामाजिक सरोकारों पर विचार व्यक्त करने वाले का बजनदार होना आवश्यक होता है लगभग सभी मामलों में विचारों से बड़ा कद नजर आता है। लोग विचारों की जगह, वह विचार किसके हैं, इस पर जरूर गौर करते हैं।  अक्सर समाचार पत्रों...

कैमरा पोर्टफोलियो से फोटोशॉप वर्क प्रोफाइल पीपीटी तक

  बात 1990 के आसपास की है उस समय शादी के लिए लड़कियों की स्पेशल फोटो खिंचाने का सिस्टम था पता चला कि शादी बाली फोटो खींचने बाले फोटोस्टूडिओ इस कार्य को बड़ी दक्षता के साथ करते हुए काली लड़की को गोरा और नाटी लड़की को लंबा बना देते थे और एक फोटो के 100 से 250 रुपये तक लेते थे। कालान्तर में ज्ञात हुआ कि फिल्म इंडस्ट्रीज में जाने के इच्छुक युवक युवतियाँ विशेष फोटो स्टूडियो से विशेष शूट आउट करके अपना पोर्टफोलियो बनवाते हैं और उन्हें प्रस्तुत कर निर्माता निर्देशक से काम की गुहार लगाते हैं एक पोर्टफोलियो में 8-10 विशेष फोटो की कीमत 10 हजार से लाखों तक होती थी। 2010 आते आते एंड्राइड मोबाइल ने यह सब व्यापार छीन लिया और चाइनीज एप्प ब्यूटी प्लस ने सभी लोगों को खूबसूरत लगने का अधिकार संवैधानिक रूप से दे दिया।  कुछ ऐसा ही मामला निजी कार्यालयों में था जॉब के लिए बॉयोडाटा बनाना एक कला हुआ करती थी जिसके सहारे इंटरव्यू लेने बाले को टोपी पहनाकर जॉब हांसिल की जाती थी उस समय दस्तावेजों को प्रस्तुत करना एक बड़ी कला मानी जाती थी और महानगरों में वाकायदा इसके प्रशिक्षण हुआ करते थे। हालांकि अब गूगल की मदद ...

कॉलेज होस्टल जैसी अंतर्राष्ट्रीय राजनीति

  दो दशक पहले तक होस्टल के कुछ छात्रों को कट्टा तमंचा रिवाल्वर रखने का शौक होता था। वर्तमान में क्या ट्रेंड है यह तो नए लड़के ही बता पाएंगे। होस्टल बाले अक्सर कॉलेज में लड़ने झगड़ने का मौका भी नहीं छोड़ते थे। हथियार अक्सर उनके आत्मविश्वाश को बढ़ाने में मददगार होते थे और कमर में खुसा तमंचा उन्हें पावर बूस्टर देता था। जिन लड़को की तमंचाधारियों से दोस्ती होती थी उन्हें भी काफी ताकत आ जाती थी क्योंकि उन्हें लगता था कि लड़ाई में भाई साहब तमंचा दे देंगे और वह सामने बाले को ठोंक देंगे। हालांकि ऐसा कभी होता न था पूरी पढ़ाई में कभी कभार एक दो बार हवाई फायरिंग कर लड़के दबंगई दिखा लेते थे शेष लड़ाइयां तो हॉकी डंडे से ही लड़ी जाती थीं।  अंतर्राष्ट्रीय राजनीति भी कुछ ऐसी ही है, यहाँ तमंचा का स्थान हाईटेक सुपरसोनिक मिसाइल ले लेती हैं और देशी बम का स्थान परमाणु बम ले लेता है हॉकी का मतलब राइफल से लगा सकते हैं पर जज़्बात बिल्कुल होस्टल छाप ही दिखते हैं। जिसके पास जितने अधिक हथियार है वह स्वयं को उतना ही दबंग मानकर लड़ने को आतुर दिखता है और पड़ोसी को धमकाता है। अक्सर होस्टल के लड़कों की तरह कई देश अपनी मिसाइ...