दो दशक पहले तक होस्टल के कुछ छात्रों को कट्टा तमंचा रिवाल्वर रखने का शौक होता था। वर्तमान में क्या ट्रेंड है यह तो नए लड़के ही बता पाएंगे। होस्टल बाले अक्सर कॉलेज में लड़ने झगड़ने का मौका भी नहीं छोड़ते थे। हथियार अक्सर उनके आत्मविश्वाश को बढ़ाने में मददगार होते थे और कमर में खुसा तमंचा उन्हें पावर बूस्टर देता था। जिन लड़को की तमंचाधारियों से दोस्ती होती थी उन्हें भी काफी ताकत आ जाती थी क्योंकि उन्हें लगता था कि लड़ाई में भाई साहब तमंचा दे देंगे और वह सामने बाले को ठोंक देंगे। हालांकि ऐसा कभी होता न था पूरी पढ़ाई में कभी कभार एक दो बार हवाई फायरिंग कर लड़के दबंगई दिखा लेते थे शेष लड़ाइयां तो हॉकी डंडे से ही लड़ी जाती थीं।
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति भी कुछ ऐसी ही है, यहाँ तमंचा का स्थान हाईटेक सुपरसोनिक मिसाइल ले लेती हैं और देशी बम का स्थान परमाणु बम ले लेता है हॉकी का मतलब राइफल से लगा सकते हैं पर जज़्बात बिल्कुल होस्टल छाप ही दिखते हैं। जिसके पास जितने अधिक हथियार है वह स्वयं को उतना ही दबंग मानकर लड़ने को आतुर दिखता है और पड़ोसी को धमकाता है। अक्सर होस्टल के लड़कों की तरह कई देश अपनी मिसाइल का परीक्षण या प्रदर्शन करके दूसरे देश पर दबाब बनाने की कोशिश करते हैं बिल्कुल ऐसा ही तो होस्टल के लड़के करते थे। किसी दूसरे होस्टल बालों को चाय की दुकान पर शर्ट थोड़ा उचकाकर तमंचा दर्शन उसी अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के समकक्ष ही तो है। जिन देशों के पास हथियार नहीं है वह बड़े देशों से दोस्ती रखते हैं या किसी गुट में शामिल हो जाते हैं बिल्कुल होस्टल के लड़कों की तरह, ताकि लड़ाई होने पर भाईसाहब या उनका गुट पिटने से बचा ले। यूक्रेन भी ऐसा ही लड़का है जो अमेरिका और नाटो से दोस्ती की दम पर रूस से लड़ मरा। ताइवान की रोज रैगिंग चीन इसलिए कर रहा था कि वह उसके गुट में ही बना रहे पर उसे लगता है कि अमेरिका का गुट ज्यादा अच्छा है सो अमेरिका के उकसावे में चीन से पंगा ले बैठा।
होस्टल के तमंचाधारी दबंग/ अध्यक्ष अक्सर खुद लड़ाई न लड़ते हैं वह तो अपने चेलों को उकसाकर किसी को भी पिटवाने की कूटनीति का प्रयोग करते हैं। कई बार नॉन हॉस्टलर्स लड़के होस्टल के समर्थन की गर्मी में कॉलेज में कुछ ज्यादा ही अकड़ दिखा देते हैं और किसी दूसरे होस्टल बालो द्वारा कूट दिए जाते हैं फिर उन्हें समर्थक होस्टल बाले कट्टा देकर लड़ाई बढ़ा देते है और कई बार होस्टल के कुछ जूनियर भेजकर उनकी मानवीय मदद की जाती है। जूनियर साथी के उसके समर्थन में सामने बाले गुट को फोड़ फाड़ देते हैं और साथ ले जाने बाले पर मुकदमा लग जाता है और बाद में वह अपना मुकदमा खुद ही लड़ते हैं यूक्रेन को अभी नाटो होस्टल में प्रवेश ही न मिला था बेचारा बाहरी व्यक्ति था अमेरिका और यूरोप के हथियारों की दम पर लड़ बैठा अब बड़े भाईसाहब सीधे लड़ने न आ रहे कुछ छोटे तमंचा उधार देकर मदद कर रहे हैं पर न तो अपने होस्टल की सेना भेज रहे और न ऑटोमेटिक रिवाल्वर दे रहे। यूक्रेन को गोलियां खरीदने को पैसा तो मिल रहा है पर उधार। अब बाद में चुकाने में कई साल चाय नाश्ता कराना पड़ेगा अपने जेब खर्च में कटौती करके। अब यूक्रेन किसी होस्टल का सदस्य होता तो होस्टल के नियम के तहत पूरा होस्टल उसके लिए लड़ता पर बेचारा एक होस्टल के एक सुपर सीनियर (अमेरिका) से दोस्ती के चक्कर मे लड़ मरा। वो वाले सुपर सीनियर लड़वाने में बड़े उस्ताद हैं अबकी बार तो उन्होंने ताइवान को भी उकसा दिया है क्योंकि उनकी खुन्नस एक दूसरे होस्टल के सुपर सीनियर से है जिनसे सीधे लड़ने में उनकी फटती है इधर तीसरे होस्टल के सुपर सीनियर (भारत) से उन्हें काफी उम्मीद है कि अगर मामला बढ़ा तो ये बाले उनकी मदद करेंगे या तो लड़ाई लड़ेंगे या फिर पंचायत करने में हमारे साथ खड़े हो जाएंगे।
होस्टल की लड़ाई में अक्सर नुकसान अपरिपक्व नए जोशीले युवा और उनके शहरी दोस्त ही झेलते हैं और बाद में अपना कैरियर दांव पर लगा देते हैं कई बार इसमें नए दबंग भी निकल आते हैं जो भविष्य में होस्टल या कॉलेज के अध्यक्ष बनकर गुण्डागर्दी में अपना भविष्य चमका लेते हैं।
कुल मिलाकर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति होस्टल बालों की लड़ाई से ज्यादा कुछ नहीं नजर आती है मनुष्य चाहे कितने भी बड़े मंच का नेता हो सामाजिक गुण वहीं होते हैं जो आम नागरिक में होते हैं देखते हैं कि प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध में दूसरों को लड़वाकर बाहर से मजा लेने और हथियार बेंचने बाला अमेरिका अबकी बार अपनी कूटनीति में सफल होता है या चीन ताइवान रूस और यूक्रेन के चक्कर मे खुद भी लड़ता है इन सबके बीच मे तीसरे होस्टल बाले भाई साहब भारत की खूब पूंछ हो रही है।
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