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आर्टिफीसियल वनाम ओरिजिनल इंटेलीजेंस

पिछले दो दशकों में ज्ञान की उपलब्धता अत्यंत सहज और सरल हो चुकी है। एक एंड्राइड फोन और एक इंटरनेट कनेक्शन से आप दुनियाँ के हर ज्ञान को एक्सेस कर सकते हैं। पहले गूगल बाबा और अब  आर्टिफिशल इंटेलीजेंस नें लोगों के हर प्रश्न का उत्तर उपलब्ध करा दिया है, अब लोगों के दिमाग़ में कोई भी प्रश्न आता है तो वह झट से गूगल कर लेते हैं।

बहुत से लोगों का मानना है कि तकनीकी नें समाज में ज्ञान के एकाधिकार को समाप्त कर दिया है और ज्ञान की पहुँच अब समाज के अंतिम पायदान पर खड़े लोगों तक पहुँच गई है, कई एक्टिविस्ट इसे एक क्रान्तिकारी परिवर्तन मानते हैं और कहते हैं कि सोशल मीडिया के आने के बाद लोग अपने अधिकारों को जानने लगे हैं और अब उन्हें मूर्ख बनाना आसान नहीं होगा, पर क्या सच में ऐसा हो रहा है?



          गूगल और आर्टिफिशल एंटीलिजेंस का ज्ञान डेटा पर आधारित है और यह डेटा भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म , वेबसाइट  या विभिन्न पोर्टल पर उपलब्ध डेटा से लिया जाता है अगर यह डेटा सही होगा तो गूगल का सर्च परिणाम भी सही होगा और अगर यह डेटा कूटरचित और भ्रामक  होगा तो उत्तर भी गलत होने की संभावना होगी। अब एक गंभीर प्रश्न यह भी आता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध डेटा अपलोड कौन कर रहा है? क्या वह अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं? क्या उन्होने उस विषय पर पर्याप्त शोध किया है?

एक उदाहरण से समझिये, मान लो मेरे एक गांव में कोई प्राचीन मंदिर है और इसके साथ कुछ प्रचलित मिथक हैं, मैं एक जागरूक युवा हूँ और उस मंदिर के मिथक को और अधिक नमक मिर्च लगाकर विकिपीडिया सहित विभिन्न प्लेटफॉर्म पर अपलोड कर देता हूँ और 100 वर्ष पुराने मंदिर को 1500 वर्ष पुराना बता देता हूँ, अब अगर कोई व्यक्ति उस मंदिर की जानकारी गूगल से चाहेगा तो गूगल इसी डेटा के आधार पर उस मिथक और मंदिर की प्राचीनता की जानकारी हमें उपलब्ध करा देगा जो कि नितांत गलत होगा।

 वास्तव में सोशल मीडिया पर कुछ भी लिखने और कोई भी कंटेंट अपलोड करने की आजादी के कारण डिजिटल प्लेटफॉर्म भ्रामक और कूटरचित अभिलेखों का डस्टबिन बन चुका है डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पर जो भी जानकारी उपलब्ध है वह ज्ञान न होकर सूचना मात्र है जो सही भी हो सकती है और गलत भी हो सकती है चूंकि आजकल सोशल मीडिया का उपयोग उत्पादों, कार्यों, व्यक्तित्व, राजनीति, व्यवसाय सबके प्रमोशन के लिए जबरदस्त तरीके से हो रहा है और प्रमोशन में हर चीज को अतिश्योक्ति की तरह पेश कर अपने को सर्वोत्तम और सही बताने की कोशिश ही की जाती है तो फिर यह माना जा सकता है कि अब सोशल मीडिया और वेबसाइट झूठ परोसने का भी बड़ा मंच है और भविष्य में यह झूठ और अधिक बड़ा डेटाबेस बन जायेगा और यही डेटा ए आई का आधार भी बनता जायेगा ।

भविष्य में ए आई टूल्स और सॉफ्टवेयर  में दिमाग़ की तरह विश्लेषण कर कुछ निर्णय लेने की क्षमता आ सकती है पर उसमें भावनायें नहीं होती, वह अपने प्रोग्राम करने बाले व्यक्ति द्वारा दिए गए निर्देशों के आधार पर ही निर्णय लेता है यह निर्देश जिस व्यक्ति द्वारा उसमें भरे गए हैं उस व्यक्ति की समझ ही ए आई की समझ है। तो क्या कोई प्रोग्रामर उसमें मनुष्य को गुमराह करने बाले निर्देशों को भी भर सकता है? निश्चित ही इसका उत्तर हाँ है।

 वास्तव में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध ज्ञान का उपयोग कैसे करना है यह मनुष्य की समझ पर निर्भर करता है और यह समझ उसे अपने माता पिता गुरु और समाज से मिलती है। कोई छात्र इस डिजिटल प्लेटफॉर्म से मुफ्त पढ़ाई करके आई आई टी में इंजीनियर बन जाता है और कोई रील बनाना सीखकर अपना समय और पढ़ाई बर्बाद  कर लेता है, कोई इस गूगल से अपना बिज़नेस ग्रो कर लेता है और कोई भ्रामक विज्ञापनों में फंसकर अपनी जमा पूंजी लुटा देता है। 

       भले ही गूगल और ए आई के ज्ञान से अब दुनियाँ लाभ लेने का दावा करे पर  क्या पढ़ना है, कहाँ से पढ़ना है, कितना पढ़ना है उसका उपयोग कैसे करना है यह समझ हमें स्वयं रखनी होगी या इसके लिए पात्र और अनुभवी लोगों का मार्गदर्शन भी  लेना होगा। अच्छे और बुरे कंटेंट के बीच का फर्क यूजर को स्वयं समझना होगा साथ ही  सही और फेक डेटा की समझ उसे स्वयं विकसित करनी होगी। भविष्य में फेक डेटा और अधिक बढ़ने की संभावना है क्योंकि एक बड़ा वर्ग लोगों को गुमराह कर उनका उपयोग अपने निजी हित में कर लेने को आतुर है, ऐसे में आर्टिफिशल इंटेलीजेंस के प्रयोग के लिए  ओरिजिनल इंटेलिजेंस की जरुरत ज्यादा है और यह आपके माता पिता गुरु मित्र और समाज ही दे सकते हैं। 

अवनीन्द्र सिंह जादौन 

शिक्षक एवं ब्लॉगर

टिप्पणियाँ

  1. मुख्य बात तो यही है, जिसे लोग समझना नहीं चाह रहे. अभी इसका उपयोग करने में लोग मौज ले रहे हैं पर निकट भविष्य में सिर्फ गुमराह होंगे.
    संपादक विहीन सोशल मीडिया, ब्लॉग, वेबसाइट ने लिखने वालों को निर्बाध स्वतंत्रता दे रखी है, जिसके चलते भ्रामक और असत्य जानकारियों का कूड़ाघर बनता जा रहा है. देखने में आ रहा है कि जानकारी के लिए लोग आधिकारिक वेबसाइट पर जाना ही नहीं चाहते.

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