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ट्रायल पीरियड पर रिश्ते हायर कीजिये

  यहाँ दादा दादी नाना नानी पापा मम्मी बुआ मौसी आदि रिश्ते ट्रायल पर मिलते हैं।  कल रात एक पिक्चर देखी ट्रायल पीरियड। पिक्चर की कहानी में एक तलाकशुदा महिला (हीरोइन) का छोटा बच्चा है जिसे स्कूल के बच्चे परेशान करते हैं फादर्स डे पर वह फादर के बारे में नहीं बता पाता तो अपनी माँ से पिता के वारे में  पूँछता है। वह अक्सर टेलीविजन पर एक कंपनी का प्रचार देखता है कि 30 दिन के ट्रायल पर कोई भी सामान ले जाओ पसंद न आये तो वापस कर दो तो वह अपनी माँ से ट्रायल पर एक पापा लाने को कहता है। उधर  हीरो नौकरी की तलाश में प्लसमेन्ट एजेंसी चलाने बाले अपने चाचा के यहाँ टिका हुआ है चाचा हीरोइन के मामा के दोस्त थे तो उनके अनुरोध पर हीरो को ट्रायल बाले पापा बना देते हैं शर्त यह थी कि ऐसा काम करना है कि एक महीने में बच्चा पापा शब्द से नफरत करने लगे और फिर जिंदगी में कभी पापा को याद न करे। पर हो जाता है उल्टा। बच्चा ट्रायल पापा पर निर्भर हो जाता है और उसके बिना उसको रहना मुश्किल हो जाता है अंत मे हीरोइन भी उससे प्यार करने लगती है और फ़िल्म का सुखद अंत हो जाता है।    फिल्म का यह कथानक आप...

गलत उच्चारण से बचिए

 हिन्दू धर्म मे एक बहुत बड़ा वर्ग "जै श्री कृष्णा" कहता मिल जाएगा बिना यह जाने कि "कृष्णा" का अर्थ क्या है? कृष्णा वास्तव में राजा द्रुपद की पुत्री द्रोपदी का मूल नाम है। जिन्हें कृष्ण अपनी सखी मानते थे ,😊  भारत मे किसी भी "अ" की जगह "आ" का उच्चारण करना एक फैशन सा बनता जा रहा है। जैसे धर्म dhram हो गया dharma कर्म karmहो गया karma  रामायण  ramayan हो गयी ramayana हिमालय himalay हो गया himalaya राम ram हो गए rama  कृष्ण krishn हो गए krishna      यह तीन कारण से हुआ  पहला इसलिए कि ज्यादातर छात्र अंग्रेजी के शिकार हैं। "अ" की मात्रा व्यंजन के साथ जब लगती है तब दिखती नहीं पर उच्चारित होती है और अधिकांश बच्चे इसे "आ" के रूप में उच्चारित करते हैं जैसे बच्चों को जब ओलम सिखाते हैं तो वह "क" को जोर से "का" ही बोलेंगे "ख"को "खा"। अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय में तो वैसे भी हिंदी विषय पर ज्यादा गौर नहीं होता है और हिंदी माध्यम के स्कूलों में भी इस उच्चारण पर कभी टोका नहीं जाता।  दूसरा इस्कॉन के अंग्र...

धार्मिक शिक्षा ज्यादा जरूरी

  एक गंभीर प्रश्न लोग अक्सर करते हैं कि मंदिरों की जगह बच्चों को स्कूल जाना चाहिए इससे व्यक्ति की प्रगति होगी देश की प्रगति होगी। प्रथम दृष्टया यह बात सत्य ही प्रतीत होती है और इसी अधूरे सत्य के आधार पर पिछले 2-3 दशकों ने लोगों ने धर्म से ऊपर शिक्षा को महत्व भी दिया है। अब 2-3 दशक बाद इस अधूरे सत्य के वास्तविक परिणाम आने शुरू हो चुके हैं व्यक्ति तथाकथित शिक्षा लेकर खूब धन दौलत कमा रहा है, भोग विलास और ऐश्वर्य को भोग रहा है। जिन्होंने 2 दशक पूर्व अपने बच्चों को धर्म से दूर कर रोजगार परक शिक्षा के लिए प्रेरित किया था अब वह एकाकी सामाजिक जीवन जीने को मजबूर हो रहे हैं बच्चे अब मात्र पित्र धर्म से विमुख हो रहे हैं क्योंकि बच्चों को धार्मिक शिक्षा से दूर रखा गया था। जिन बच्चों ने शिक्षा में अच्छे अंक नहीं हाँसिल किये थे वह भी एन केन प्रकारेण साम, दाम, दंड, भेद, चोरी, वेइमानी, पिता की संपत्ति आदि बेंचकर भी भोग विलास और ऐश्वर्य को भोग लेना चाह रहे हैं। वास्तव में स्कूली शिक्षा व्यक्ति को किसी कार्य आदि को करने की योग्यता या अहर्ता प्रदान करती है पर धार्मिक शिक्षा आपको परिवार उपयोगी, समाजउप...

पुरुष क्यों बनना चाहती स्त्री?

  कुछ दिन पहले टेलीविजिन पर एक प्रचार बड़े जोर शोर से आता था जिसमे स्कूटी चलाती लड़कियाँ कहती थी "व्हाई शुड बॉयज हैव आल द फन" इसे देखकर अन्य लड़कियों में अपने माता पिता से स्कूटी पाकर पुरुषों की तरह मस्ती करने का सपना हिलोर मारने लगता था। वास्तव में यह टैग लाइन अप्रत्यक्ष रूप से यह बताती थी कि सभी प्रकार की मस्ती करने का अधिकार सिर्फ लड़कों को ही है और यह लड़कियों को भी मिलना चाहिए।     यहाँ प्रश्न यह उठता है कि किस प्रकार की मस्ती? सड़कों पर तेज़ रफ़्तार ड्राइविंग करने की या लड़को की तरह बाइक में पेट्रोल भरवाकर दिन भर आवारागर्दी करते हुए इसे उसे छेड़ते रहने की?  शराब पी कर उत्पात मचाने की या क्लब रेस्टॉरेंट में पार्टियाँ करते हुए सिगरेट फूंकने की? वास्तव में लड़कियों और महिलाओं को अक्सर इस बात की टीस उठती है कि उन्हें पुरुषों की तरह मस्ती करने की आजादी नहीं मिली। शायद इसी कल्पना का परिणाम है कि कॉलेज स्तर पर अब लड़कियाँ माता पिता के टोका टाकी भरे बंधन मुक्त होकर लड़कों के जैसा जीवन जीने को आतुर दिखती हैं।        आप किसी भी बड़े कॉलेज में  ग्रेजुएशन क...

अधजल गगरी छलकत जाय

  एक फ़िल्म के सीन में एक कक्षा में एक नए प्रोफेसर पढ़ाने आये उन्होंने छात्रों से पूँछा कि आपको गायत्री मंत्र आता है। ज्यादातर छात्रों को नहीं आता था पर 2-3 छात्रों ने हाँ में उत्तर दिया तो प्रोफेसर ने उनमें से एक छात्र को सुनाने को कहा। छात्र ने उसे सुना दिया, प्रोफेसर ने पुनः प्रश्न किया कि इसका अर्थ बताओ, छात्र चुप हो गया। हमारे समाज मे लोगों और  विशेषकर हिंदुओ की कमोवेश यही स्थिति है। लेख पढ़ने बाले ज्यादातर लोगों भी मन में सोच रहे होगे कि उन्हें भी अर्थ तो पता ही नहीं है। और जब अर्थ नहीं पता है तो मंत्र जप के समय आप अपने अंतर्मन में वह भाव जागृत कर ही नहीं पाएंगे जो उस मंत्र के उच्चारण के समय जाग्रत होना चाहिए था।    सामाजिक रूप से पढ़े लिखे लोगों की स्थिति को उपरोक्त एक उदाहरण से ही आप समझ सकते हैं। चलिए अब एक एडुकेटेड टाइप उदाहरण लेते हैं,  सेव गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे गिरता है और इसकी खोज न्यूटन ने की थी, इस एक लाइन को याद रखना किसी कक्षा दो तीन के छात्र के लिए भी आसान हो सकता है, उसे एक सप्ताह में यह आसानी से रटाया जा सकता है। इस तरह वह छात्र कक्षा 10 के ...

माता पिता को कैरिअर कॉउंसलिंग की आवश्यकता

      हर माता पिता का सपना होता है कि उसका बेटा/बेटी एक सफल इंसान बने और इसके लिए वह अपने बच्चे को श्रेष्ठ  शिक्षा दिलाकर डॉक्टर या इंजीनियर बनना चाहते हैं। माता पिता बच्चे की शिक्षा के खर्च की पूर्ति के लिए ही दिन रात मेहनत करते हैं ताकि बच्चों की पढाई में किसी तरह का आर्थिक अवरोध न आये। इसके बाबजूद बड़ी संख्या में शिक्षित किशोर असफल होकर घरों में बैठ जाते हैं और माता पिता इस असफलता का कोई कारण नहीं खोज पाते हैं ,उनका कहना बस इतना होता है कि पढ़ने में मन नहीं लगाया इसलिए सेलेक्ट नहीं हो पाया।     वास्तव में कक्षा 10 तक पढ़ाई करने वाले छात्रों को यह जानकारी ही नहीं होती है कि उन्हें पढ़कर करना क्या है? माता पिता ही अपने बच्चों को बताते हैं कि उन्हें डॉक्टर बनना है इंजीनियर, इसके बाद वह इसके लिए तैयारी शुरू कर देते हैं। ज्यादातर माता पिता उन पर इन्ही दो में से किसी एक परीक्षा में सेलेक्ट होने का दबाब जाने या अनजाने डालते हैं।  कक्षा 12 के बाद की प्रतियोगी परीक्षा में कुछ  प्रतिशत मेधावी सफल हो जाते हैं शेष बचे में से कुछ छात्रों के पैसे बाले अभिभा...

श्रोता नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय

    यह व्यंग्य केवल व्यंग्य मात्र नहीं है   निंदक नियरे रखने का चलन समाप्त हो गया है क्योंकि निंदा झेल पाने लायक लोग अब बचे ही नहीं है अब तो लोग दुनियाँ भर की समस्याओं को दिल मे लिए घूमते हैं और जब तक उन्हें दूसरे को न सुना दें तब तक उसका प्रेशर झेलना उनके लिए कठिन हो जाता है। हाई ब्लड प्रेशर और हाइपर टेंशन वास्तव में कोई बीमारी नहीं है यह तो चुगली और आलोचना न कर पाने की स्थिति में हृदय और दिमाग पर उत्पन्न दबाब मात्र है इसलिए मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि पुरुष अगर दिन भर में मात्र आधा घंटा अपने मित्रों, रिश्तेदारों, सहकर्मियों और विरोधी राजनीतिक पार्टी की चुगली या आलोचना किसी से कर लें तो वह ब्लड प्रेशर की समस्या से बच सकते हैं, वहीं स्त्रियां अगर 1 घंटे अपने पति, सास, ननद और पड़ोसन की चुगली/आलोचना फोन पर अपनी माँ या किसी सहेली से कर लें तो वह ब्लड प्रेशर और हाइपर टेंशन से बच सकती हैं। वैसे भी पुरुषों को चुगली कर पाने के कम अवसर मिलते हैं इसलिए वह ब्लड प्रेशर और हायपरटेंशन से ज्यादा ग्रसित होते हैं।     आलोचना सुन पाने के लिए एक अदद श्रोता की जरूरत होती है हालांकि प...