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धार्मिक शिक्षा ज्यादा जरूरी

 एक गंभीर प्रश्न लोग अक्सर करते हैं कि मंदिरों की जगह बच्चों को स्कूल जाना चाहिए इससे व्यक्ति की प्रगति होगी देश की प्रगति होगी। प्रथम दृष्टया यह बात सत्य ही प्रतीत होती है और इसी अधूरे सत्य के आधार पर पिछले 2-3 दशकों ने लोगों ने धर्म से ऊपर शिक्षा को महत्व भी दिया है। अब 2-3 दशक बाद इस अधूरे सत्य के वास्तविक परिणाम आने शुरू हो चुके हैं व्यक्ति तथाकथित शिक्षा लेकर खूब धन दौलत कमा रहा है, भोग विलास और ऐश्वर्य को भोग रहा है। जिन्होंने 2 दशक पूर्व अपने बच्चों को धर्म से दूर कर रोजगार परक शिक्षा के लिए प्रेरित किया था अब वह एकाकी सामाजिक जीवन जीने को मजबूर हो रहे हैं बच्चे अब मात्र पित्र धर्म से विमुख हो रहे हैं क्योंकि बच्चों को धार्मिक शिक्षा से दूर रखा गया था। जिन बच्चों ने शिक्षा में अच्छे अंक नहीं हाँसिल किये थे वह भी एन केन प्रकारेण साम, दाम, दंड, भेद, चोरी, वेइमानी, पिता की संपत्ति आदि बेंचकर भी भोग विलास और ऐश्वर्य को भोग लेना चाह रहे हैं।

वास्तव में स्कूली शिक्षा व्यक्ति को किसी कार्य आदि को करने की योग्यता या अहर्ता प्रदान करती है पर धार्मिक शिक्षा आपको परिवार उपयोगी, समाजउपयोगी और कर्तव्यनिष्ठ बनाती है। चूंकि हमारे यहाँ धार्मिक शिक्षा की कोई औपचारिक व्यवस्था शिक्षा प्रणाली में नहीं है इसलिए इसको सनातनी पूजा पद्यति और मंदिरों से जुड़कर  व्यवहारिक रूप से सिखाने की व्यवस्था माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और पुजारियों ने अनंत काल से सम्हाले रखा था जिसे आधुनिक काल के तथाकथित तार्किक बुद्धिजीवी युवाओं ने गैर जरूरी बताते हुए अपने जीवन से निकाल फेका और एक पीढ़ी उपरांत ही पूरा समाज कर्तव्यहीन नजर आने लगा। 
   धर्म कभी भी मनुष्य को अनैतिक कार्य करने का आदेश नहीं करता है किसी भी धर्म के किसी भी धार्मिक ग्रंथ को खोलकर देखिए उसमें सदैव सत्कर्म करने सम्बंधी दिशा निर्देश और व्यवस्थाएं ही अंकित मिलेगी। वास्तव में धर्म एक स्वस्थ्य दिनचर्या और जीवन शैली के साथ अनुशासित सामाजिक कर्तव्य, पारिवारिक कर्तव्य और परोपकार को बढ़ाने की एक परंपरागत शिक्षा व्यवस्था है जिसे कोई मंदिर जाकर कोई मस्जिद जाकर कोई गुरुद्वारा जाकर कोई चर्च जाकर या विभिन्न धार्मिक आयोजनों के माध्यम से स्वयं में अंगीकृत कर अपनी आगे की पीढ़ी में ले जाता है। सरकार द्वारा लागू शिक्षा व्यवस्था के बाद आप केवल रोजगार हाँसिल कर पाते हैं पर धार्मिक शिक्षा में व्यक्ति रोजगार के माध्यम से समाज का भला कैसे हो, परिवार की जिम्मेदारियों और कर्तव्यों का निर्वहन कैसे किया जाए और परोपकारी जीवन जीते हुए एक अच्छे नागरिक के रूप में अपना योगदान कैसे दिया जाए यह सब सीखता है। अगर कोई छात्र विद्यालय की शिक्षा में असफल भी है पर वह धार्मिक शिक्षा लिए है तो भी एक अच्छे नागरिक के रूप में समाज मे अपना योगदान सदैव देता रहेगा।
   बदलते वक्त के साथ भौतिक सुखों में लिप्त नई पीढ़ी केवल इसलिए कर्तव्य और मानवता से विहीन हो रही है क्योंकि उनके परिजनों ने धार्मिक दिशा निर्देशों और ग्रंथो में लिखे सामाजिक सद्भाव, परोपकार और मानवता के सिद्धांतों से अपना मुंह मोड़ लिया है और वह मंदिरों को केवल ईश्वर से स्वहित कुछ मांगने के लिए की जाने बाली पूजापाठ और प्रक्रियाओं का एक स्थान मात्र समझ बैठे हैं। 
 पुराने समय मे गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था में धार्मिक शिक्षा को बराबरी का स्थान था बच्चे धार्मिक कार्यों को करते हुए विभिन्न सामाजिक और आर्थिक विषयों ने निपुण बनाये जाते थे इसलिए वह समाजउपयोगी नागरिक बनते थे अंग्रेजो ने इस व्यवस्था को नष्ट किया और मात्र 70 साल में सम्पूर्ण भारतीय समाज छिन्न भिन्न होकर निज भौतिक सुखों और भोगविलास में लिप्त हो चुके हैं अभी भी अगर आप धर्म को गैर जरूरी समझते रहे तो आगे आने बाले समय मे लोग जानवर के सदृश व्यवहार करते नजर आएंगे। 
अवनीन्द्र सिंह जादौन

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