हर माता पिता का सपना होता है कि उसका बेटा/बेटी एक सफल इंसान बने और इसके लिए वह अपने बच्चे को श्रेष्ठ शिक्षा दिलाकर डॉक्टर या इंजीनियर बनना चाहते हैं। माता पिता बच्चे की शिक्षा के खर्च की पूर्ति के लिए ही दिन रात मेहनत करते हैं ताकि बच्चों की पढाई में किसी तरह का आर्थिक अवरोध न आये। इसके बाबजूद बड़ी संख्या में शिक्षित किशोर असफल होकर घरों में बैठ जाते हैं और माता पिता इस असफलता का कोई कारण नहीं खोज पाते हैं ,उनका कहना बस इतना होता है कि पढ़ने में मन नहीं लगाया इसलिए सेलेक्ट नहीं हो पाया।
वास्तव में कक्षा 10 तक पढ़ाई करने वाले छात्रों को यह जानकारी ही नहीं होती है कि उन्हें पढ़कर करना क्या है? माता पिता ही अपने बच्चों को बताते हैं कि उन्हें डॉक्टर बनना है इंजीनियर, इसके बाद वह इसके लिए तैयारी शुरू कर देते हैं। ज्यादातर माता पिता उन पर इन्ही दो में से किसी एक परीक्षा में सेलेक्ट होने का दबाब जाने या अनजाने डालते हैं। कक्षा 12 के बाद की प्रतियोगी परीक्षा में कुछ प्रतिशत मेधावी सफल हो जाते हैं शेष बचे में से कुछ छात्रों के पैसे बाले अभिभावक उन्हें अच्छे निजी मेडिकल या इंजिनीरिंग विद्यालयों में प्रवेश दिला देते हैं और बाकी असफल होकर ग्रेजुएशन करके इधर उधर भटकने लगते हैं। क्योंकि उनके अंदर अन्य किसी कार्य को करने की स्किल नहीं है। वास्तव में अभिभावकों को न तो प्रतियोगी परीक्षाओं के तरीकों, सिलेबस, उनके कट ऑफ, कॉउंसलिंग प्रक्रिया, विद्यालयों की स्थिति, पाठ्यक्रम के बाद नौकरी के अवसर आदि की जानकारी होती है और न अपने बच्चे की क्षमताओं की। अभिभावक तो अपने पास पड़ोस रिश्तेदार में किसी चयनित डॉक्टर या इंजीनियर की तरह अपने बच्चे के भी डॉक्टर या इंजीनियर बनाने का सपना पाल लेते हैं और इस सपने को पूरा करने के लिए अपना समय बच्चे की स्कूल और कॉलेज की फीस भरने के लिए मेहनत में लगा देते हैं।
कुछ अच्छे विद्यालयों को छोड़कर अधिकांश में बच्चों के कैरियर कॉउंसिल की कोई सुविधा नहीं है अधिकांश विद्यालय बच्चों की विषयी और अन्य क्षमताओं का मूल्यांकन करके अभिभावकों के साथ बात करने का कोई अवसर नहीं देते हैं अधिकांश विद्यालय कक्षा 6 से कक्षा 12 तक होने बाली विभिन्न छात्रबृत्ति परीक्षाओं , राष्ट्रीय स्तर के कॉम्पटीशन आदि के लिए बच्चों पर बहुत अधिक मेहनत नहीं करते हैं और इनको मात्र औपचारिकता के रूप में ही देखते हैं। अधिकांश विद्यालयों में विज्ञान मॉडल और क्राफ्ट आदि प्रतियोगिता की केवल सूचना मात्र दी जाती है, जिम्मेदार अभिभावक ही बच्चों के लिए मॉडल आदि तैयार करवा देते हैं और वही चुनिंदा छात्र बार बार सफल होते दिखते हैं, शेष छात्रों को विद्यालय स्तर से अध्यापकों द्वारा न कोई परामर्श मिलता है और न ही प्रोजेक्ट सामिग्री, इनमें वह विद्यालय भी शामिल हैं जिनकी वार्षिक फीस लाखों रुपये है। ऐसे में छात्रों की प्रतिभाओं का सही मुल्यांकन नहीं हो पाता है। कक्षा 11 के प्रवेश के साथ ही अधिकांश अभिभावक यही चाहते हैं कि छात्र अब केवल प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी और छात्र केवल स्कूल और कोचिंग के बीच फुटबॉल बन जाता है। सफल हुआ तो बहुत अच्छा और असफल हुआ तो अब किसी अन्य कार्य लायक उसमें कोई योग्यता नहीं होती है।
वास्तव में कैरियर कॉउंसलिंग की जरूरत छात्रों से अधिक अभिभावकों को है ताकि वह समय रहते यह समझ सकें कि बच्चों के लिए जीवन मे कौन कौन सी संभावनाएं हैं। उन्हें यह भी पता हो कि अगर बच्चे को डॉक्टर या इंजीनियर बनाना है तो बच्चों को कितने घंटे पढ़ना होगा तैयारी के साथ बच्चों की दिनचर्या और खान पान कैसा हो इस प्रतियोगी परीक्षा की पूरी प्रक्रिया क्या है? कुल कितनी सीट सरकारी मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज में होती है? कितना कट ऑफ होता है? कितना पढ़ाई का खर्च है? डिग्री के बाद जॉब मिलेगी या प्राइवेट सेक्टर मिलेगा? उसमें कितनी न्यूनतम सैलरी मिल सकेगी? उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि कॉमर्स और कला विषय से भी कैरियर की बहुत अच्छी संभावनाएं हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि पैरामेडिकल कोर्स के बाद भी लाखों रुपये महीने आसानी से कमाए जा सकते हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि मैनेजमेंट के कोर्स करके भी अच्छा कैरिअर बन सकता है। अभिभावकों को यह भी पता होना चाहिए कि पत्रकारिता , फोटोग्राफी, फार्मा सेक्टर, मार्केटिंग सेक्टर, खेलकूद, एस एस सी, बैंकिंग आदि किसी भी क्षेत्र में उच्च शिक्षित प्रोफेशनल की मांग बहुत अधिक है और उनके वेतन भी आकर्षक हैं साथ ही उनमें पदों की संख्या भी पर्याप्त है।
बच्चों के अभिभावकों को अगर समय से कैरियर के विभिन्न क्षेत्रों की जानकारी होगी तो वह अपने बच्चों को ज्यादा बेहतर तरीके से बातों को समझा सकेंगे, वह छात्रों की रुचि जानकर समय से उस क्षेत्र में उसकी स्किल को विकसित कर सकेंगे। वह बच्चों को बता सकेंगे कि अगर अभी आई आई टी में सिलेक्शन नहीं हुआ है तो वह पुनः परीक्षा पास करके एम टेक में आई आई टी में प्रवेश ले सकते हैं या आई आई टी सिस्टम द्वारा आयोजित प्रतियोगी परीक्षा पास करके एम.एस.सी. भी कर सकते हैं, वह बच्चों को बता पाएंगे कि ड्राइंग विषय से भी आई.आई.टी और एन. आई. टी. में प्रवेश पाया जा सकता है। वह अपने बच्चों को बता पाएंगे कि सेना में भी डॉक्टर बना जा सकता है, वह बता पाएंगे कि सेना में शिक्षक भी होते हैं और वह पढ़ाते हैं। इन सब के लिए अभिभावकों को समय समय पर जानकारी देने के लिए उनकी कॉउंसलिंग जरूरी है ताकि वह इन सबके विषय मे स्वयं जान सकें या अभिभावक स्वयं समय निकालकर इन सबकी जानकारी हांसिल करें। अगर अभिभावक कक्षा 8 के बाद साल में 2 बार भी 2 घंटे का समय बच्चे के भविष्य की संभावनाओं की जानकारी के लिए दे दे तो उनके बच्चे न सिर्फ बच्चे बेहतर कैरियर के अवसर चुन सकेंगे बल्कि इससे देश में असफल घूम रहे मेधावी निठल्ले युवाओं की संख्या में भी कमी आएगी।
अवनीन्द्र सिंह जादौन
शिक्षक एवं ब्लॉगर
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