एक फ़िल्म के सीन में एक कक्षा में एक नए प्रोफेसर पढ़ाने आये उन्होंने छात्रों से पूँछा कि आपको गायत्री मंत्र आता है। ज्यादातर छात्रों को नहीं आता था पर 2-3 छात्रों ने हाँ में उत्तर दिया तो प्रोफेसर ने उनमें से एक छात्र को सुनाने को कहा। छात्र ने उसे सुना दिया, प्रोफेसर ने पुनः प्रश्न किया कि इसका अर्थ बताओ, छात्र चुप हो गया। हमारे समाज मे लोगों और विशेषकर हिंदुओ की कमोवेश यही स्थिति है। लेख पढ़ने बाले ज्यादातर लोगों भी मन में सोच रहे होगे कि उन्हें भी अर्थ तो पता ही नहीं है। और जब अर्थ नहीं पता है तो मंत्र जप के समय आप अपने अंतर्मन में वह भाव जागृत कर ही नहीं पाएंगे जो उस मंत्र के उच्चारण के समय जाग्रत होना चाहिए था।
सामाजिक रूप से पढ़े लिखे लोगों की स्थिति को उपरोक्त एक उदाहरण से ही आप समझ सकते हैं। चलिए अब एक एडुकेटेड टाइप उदाहरण लेते हैं, सेव गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे गिरता है और इसकी खोज न्यूटन ने की थी, इस एक लाइन को याद रखना किसी कक्षा दो तीन के छात्र के लिए भी आसान हो सकता है, उसे एक सप्ताह में यह आसानी से रटाया जा सकता है। इस तरह वह छात्र कक्षा 10 के छात्र के समान स्वयं को ज्ञानी मान सकता है क्योंकि दोनों को ही गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत की जानकारी है पर यह सिद्धांत मात्र इतना ही नहीं है और इतना विस्तार से है कि एक पीएचडी छात्र को भी समझने में मुश्किल आ सकती है। सिद्धान्त के मौलिक स्टेटमेंट को जान लेने के बाद कोई भी कक्षा 10 का छात्र इस सिद्धांत पर रिसर्च कर रहे उस पीएचडी के छात्र को उसके समकक्ष ज्ञानी मानकर टक्कर देने के लिए तैयार हो जाता है।
एक खिलाड़ी टाइप का उदाहरण देकर बात समाप्त करूंगा। किसी शूटिंग रेंज पर .22 बोर राइफल से अच्छा निशाना लगाकर मैडल जीत लेने बाले व्यक्ति को स्वयं के सैनिक होने को भ्रम हो सकता है युद्ध की स्थिति में वह बॉर्डर पर जाकर स्नाइपर से 100-200 दुश्मनों को मारने की कल्पना कर सकता है और समाज मे लोगों के सामने अपने निशानेवाज होने की कहानियाँ और बॉर्डर पर जाने की इच्छा को गर्व के साथ बता सकता है। कई बार तो वीडियो गेम में शूटिंग करके भी लोगों को ऐसा लगने लग जाता है कि वह एक ट्रेंड सैनिक से ज्यादा वेहतर निशानेवाज बन चुके हैं पर अगर इन्ही व्यक्तियों को 24 घण्टे के लिए बॉर्डर पर रेत की बोरियों के पीछे बिठा दिया जाए जहाँ चारो तरफ से दुश्मन फायरिंग कर रहा हो तो डर के मारे निशाना लगाना तो दूर ये राइफल को लोड करना तक भूल जाएंगे।
अब आते हैं मुख्य बात पर। वास्तव में इंटरनेट और सोशल मीडिया से प्राप्त टैग लाइन सूचनाओं को प्राप्त कर बहुत से बुद्धिजीवी स्वयं को डॉक्टर, इंजीनियर, लेखक, दार्शनिक, चिंतक, विचारक, समाज सेवी, पर्यावरण प्रेमी और धर्माचार्य आदि मान बैठे हैं, कुछ ने तो बाकायदा सोशल मीडिया पर ऐसा घोषित करना शुरू भी कर दिया है दो चार लघु कथा लिखने बाला वरिष्ठ लेखक बन चुका है एक दो कविता लिखने बाला कवि हो चुका है। ज्ञान की यह स्थिति ही सामाजिक उथल पुथल, व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा और द्वेष, और सामाजिक भ्रम का कारण बन रही है।
ऐसे सभी तात्कालिक ज्ञानी अब समाज मे किसी भी धार्मिक ग्रंथ, किसी भी विचारधारा, किसी भी जाति,धर्म, राजनीतिक पार्टी, विधायक मंत्री, पुस्तकों, सरकारी सिस्टम आदि की समीक्षा प्रस्तुत करने, आलोचना करने, टिप्पणी करने के लिए 24*7 अधिकृत और प्रामाणिक रूप से उपलब्ध हैं। समाज भी उनके ज्ञान से अभिभूत होकर नतमस्तक है। सोशल मीडिया पर विभिन्न प्रकार के समूहों के माध्यम से नई नई विचारधाराएं बड़ी तेजी से जन्म लेकर फलती फूलती जा रहीं है। सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचे में बहुत तेजी से बदलाव आ रहा है, भविष्य में यह बदलाव कितना लाभकारी होगा या कितना नुकसानदायक होगा इसकी कल्पना करना जरा मुश्किल होगा पर अगले एक दशक में सामान्य पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन बिल्कुल बदल चुका होगा। क्योंकि ज्ञान अब समुद्र की तरह सम्पूर्ण श्रष्टि में उफान मार कर लोगों को अपने आगोश में लेने को तत्पर है।
अवनीन्द्र सिंह जादौन
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