सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

बदलाव की बातें, लेकिन जिम्मेदारी से परहेज़

गली-मोहल्लों, नुक्कड़ों और चाय की दुकानों पर देश की समस्याओं पर चर्चा करना हमारे समाज का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है। देश, राजनीति, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और व्यवस्था जैसे गंभीर विषयों पर युवा से लेकर बुजुर्ग तक बड़ी बेबाकी से राय रखते हैं। उनकी बातों में


समाधान भी होते हैं और सरकार को दी जाने वाली सलाहें भी। लगता है जैसे अगर यही लोग देश चला लें तो हर समस्या चुटकियों में हल हो जाए।


मैंने अपने छात्र जीवन से लेकर अब तक  करीब ढाई दशकों में यही देखा है कि चर्चा कभी थमती नहीं, लेकिन बदलाव कभी  आता नहीं । जिन दोस्तों को कॉलेज में डिबेट करते देख लगता था कि अगर यह व्यक्ति सही जगह पहुंच गया तो व्यवस्था बदल डालेगा, वही आज जब व्यवस्था का हिस्सा बने हैं तो उसी में समा गए हैं। क्रांतिकारी विचारक, सिस्टम के 'साइलेंट पार्टनर' बन चुके हैं।
दरअसल, चर्चा करना और व्यवस्था में काम करना दो अलग-अलग चीजें हैं। देश को चलाना कल्पनाओं से नहीं, ज़मीनी मेहनत से होता है। यह कहना आसान है कि सरकार को यह करना चाहिए, लेकिन हजारों पुरानी व्यवस्थाओं और नियमों के बीच बैठकर एक ईमानदार निर्णय लेना कठिन है।
हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ हर कोई चाहता है कि कोई और सामने आए और लड़ाई लड़े। हम चाहते हैं कि कोई भगत सिंह बने, लेकिन वह हमारे घर में न हो। हम चाहते हैं कि नेता ईमानदार हों, लेकिन खुद राजनीति से दूर रहते हैं। हमें सिस्टम बदलना है, लेकिन न तो हम खुद उस पद तक पहुंचना चाहते हैं, न ही आवाज़ उठाने का साहस करते हैं।
अगर हम वास्तव में बदलाव चाहते हैं तो हमें खुद को बदलना होगा। आलोचना से पहले आत्मावलोकन जरूरी है। जब तक हम खुद बदलाव का हिस्सा नहीं बनेंगे उसका नेतृत्व नहीं करेंगे, तब तक हर चौराहे पर चर्चा होती रहेगी, और देश वहीं का वहीं खड़ा रहेगा।
समय आ गया है कि हम सिर्फ बातों तक सीमित न रहें, बल्कि उस एक कदम की शुरुआत करें, जो हमें वास्तव में बदलाव की दिशा में ले जाए।
📌 लेखक अवनीन्द्र सिंह जादौन पेशे से  शिक्षक हैं और शिक्षा और सामाजिक विषयों के ब्लॉगर हैं। यह लेख उनके निजी विचारों पर आधारित है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आर्टिफीसियल वनाम ओरिजिनल इंटेलीजेंस

पिछले दो दशकों में ज्ञान की उपलब्धता अत्यंत सहज और सरल हो चुकी है। एक एंड्राइड फोन और एक इंटरनेट कनेक्शन से आप दुनियाँ के हर ज्ञान को एक्सेस कर सकते हैं। पहले गूगल बाबा और अब  आर्टिफिशल इंटेलीजेंस नें लोगों के हर प्रश्न का उत्तर उपलब्ध करा दिया है, अब लोगों के दिमाग़ में कोई भी प्रश्न आता है तो वह झट से गूगल कर लेते हैं। बहुत से लोगों का मानना है कि तकनीकी नें समाज में ज्ञान के एकाधिकार को समाप्त कर दिया है और ज्ञान की पहुँच अब समाज के अंतिम पायदान पर खड़े लोगों तक पहुँच गई है, कई एक्टिविस्ट इसे एक क्रान्तिकारी परिवर्तन मानते हैं और कहते हैं कि सोशल मीडिया के आने के बाद लोग अपने अधिकारों को जानने लगे हैं और अब उन्हें मूर्ख बनाना आसान नहीं होगा, पर क्या सच में ऐसा हो रहा है?           गूगल और आर्टिफिशल एंटीलिजेंस का ज्ञान डेटा पर आधारित है और यह डेटा भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म , वेबसाइट  या विभिन्न पोर्टल पर उपलब्ध डेटा से लिया जाता है अगर यह डेटा सही होगा तो गूगल का सर्च परिणाम भी सही होगा और अगर यह डेटा कूटरचित और भ्रामक  होगा तो उत्तर भी गलत होने क...

मोबाइल है तो निगरानी में हो

दो घटनाये देखिये  इनकम टैक्स डिपार्टमेंट नें ai की मदद से लाखों टैक्स चोरी करने बालों को नोटिस भेज दिया  कर्नाटक में इनकम टैक्स नें छोटे व्यापरियों को लाखों के नोटिस थमाए तो दुकानदारों क्यू आर कोड दुकान से हटाए।  ये तो एक ट्रेलर मात्र है अभी पिक्चर बाक़ी है  2007 के लगभग दलजीत चौधरी जी  इटावा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बने थे उसी समय  नया नया मोबाइल आया था और चम्बल के डकैतो और उनके मुखबिरों के लिए अच्छी सुविधा बन गई । तत्कालीन एस टी एफ और एस ओ जी से जुड़े लोग बताते हैं कि एसएसपी साहब नें इसी टेक्नोलॉजी को डकैत विहीन इटावा के लिए हथियार बना लिया और मोबाइल तकनीक के सहारे ही सभी डकैत मुखबिरी की दम पर निपटा दिए गए।  समय बदला और मल्टीमीडिया एंड्राइड फोन आये और अम्बानी नें सस्ते रिचार्ज और इंटरनेट से लोगों की दुनियाँ बदल दी। सोशल मीडिया पर जुड़ने की ललक नें हर हाँथ में मल्टीमीडिया मोबाइल आ गया अब बारी थी सरकार द्वारा इसी तकनीक को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की।  बैंक नें अपने कस्टमर को एस एम एस सुविधा के लिए नंबर माँगा, अधिक लेनदेन के लिए पेन कार्ड बनबाने...

घास नुचवा

उस समय उनकी उम्र 59 साल की थी शरीर दुबला पतला पर गजब की फुर्ती वाला था वो जूनियर स्कूल में प्रधानाध्यापक थे और नाम था कामता प्रसाद ।मन बचन और कर्म से स्कूल को समर्पित या यूँ कहे कि स्कूल और शिक्षा उनकी आत्मा में बसती थी उनका विद्यालय सरकारी होने के बाबजूद इलाके के सबसे अच्छे स्कूल में गिना जाता था और क्यूँ ना गिना जाये सुबह से लेकर शाम तक वो अपना सारा काम जिम्मेदारी से पूरा करते थे ।बच्चो से उन्हें बहुत प्यार था इसलिए बच्चो की उपस्थिति भी शत प्रतिशत रहती थी  शिक्षा विभाग के कई बड़े अधिकारी उस स्कूल में आकर मास्टर साहब की तारीफ कर चुके थे ।मास्टर साहब अपने रिटायरमेंट के नजदीक पहुँच कर बड़ा सुकून महसूस करते थे और कहते थे कि अपना काम ईमानदारी से करो तो रात को नींद बहुत अच्छी आती है फिर अगर मैंने अच्छा किया होगा तो ऊपर वाला भी मेरे साथ अच्छा ही करेगा     सरकार शिक्षा के प्रति बहुत गंभीर थी इसलिए उसने गरीब बच्चो को अनिवार्य शिक्षा के लिए शिक्षा अधिकार अधिनियम कानून लागू कर दिया और शिक्षा विभाग के अधिकारी उस अधिनियम की शर्तो और निर्देशों का पालन करवाने के लिए लगातार विद्यालयो...