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धर्म का अर्थशास्त्र

 टी वी में समाचार पर देख रहा था कि कुम्भ में चाय नाश्ते की एक दुकान की बेस प्राइज 80 लाख थी एक व्यक्ति नें 93 लाख देकर उसको अपने नाम आवंटित कराया तो अब निश्चित ही वह कम से कम दोगुना तो कमायेगा। 


यह धर्म का अर्थशास्त्र है जिसमें सरकार नें अपने लिए राजस्व कमाया, दुकानदार नें प्रॉफिट कमाया, लोगों नें बस्तुएँ खरीदी तो उन बस्तुओं से जुड़े लोगों को रोजगार और पैसे मिले और लोगों के मन में धर्म के प्रति आस्था का संचार भी हुआ।

       लेकिन भारत में एक बड़ा बौद्धिक वर्ग धर्म के खिलाफ है, उन्हें लगता है धर्म अफीम है, नशा है और यह लोगों को बर्बाद कर देगा। उन्हें यह भी लगता है कि भोग विलास की बस्तुओं के कारोबार ही लोगों को रोजगार दे सकते हैं पर शायद उन्हें यह पता न होगा कि जम्मू कश्मीर में राजस्व का एक बड़ा हिस्सा वैष्णो देवी और अमरनाथ यात्रा से प्राप्त होता है जम्मू कश्मीर में पूरी मुस्लिम आवादी के आय के श्रोत का बड़ा हिस्सा धार्मिक यात्राओं और श्रद्धालुओं के आने जाने रुकने और शॉपिंग से ही प्राप्त होता है अगर सरकार एक साल के लिए इन दो यात्राओं पर प्रतिवन्ध लगा दे तो इन इलाकों के लाखों लोगों को अपने खर्चे निकालना मुश्किल होता है। 
 ऋषिकेश, हरिद्वार, बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम से लाखों लोगों के  प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से पेट पलते हैं। साउथ में कई राज्यों नें स्थिति मंदिरों से उन राज्यों में पर्यटन के अवसर बनते हैं यहाँ तक कि अजमेर शरीफ जैसे स्थानों का भी आर्थिक श्रोत यही धर्म ही है। सऊदी अरब जैसे देशो को भी हज यात्रा से बहुत सारा राजस्व प्राप्त होता है और चीन भी कैलाश मानसरोवर यात्रा पर टैक्स के रूप में खूब कमाई कर लेता है


भारत में होली दीपावली रक्षाबंधन जैसे त्योहारों के लिए दीपक, पिचकारी और राखी का निर्माण फैक्ट्रीयों में 6-6 महीने होता रहता है और यह सब माल मात्र 15 दिन में बिक जाता है और इसके बिकने पर हजारों दुकानदार आर्थिक लाभ कमाते हैं साथ ही फैक्ट्री में काम कर रहे लोगों को भी रोजगार मिलता है और इस कमाई को करने बाले एक धर्म के नहीं होते है इसमें हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई सभी को कमाने के अवसर मिलते हैं।


 2024 में एक साल में श्री राम मंदिर का दर्शन करने 16 करोड़ लोग आये और इस कारण एक ही साल में अयोध्या में 80,000 करोड़ का रेवेन्यू जनरेट हुआ अगर 10% टैक्स भी जोड़े तो सरकारी खजाने में 8000 करोड़ गया 
    2013 में इलाहाबाद में महाकुम्भ हुआ था उसका बजट लगभग 1200 करोड़ का बजट था और उस पर 12000 करोड़ का रेवेन्यू जनरेट हुआ था 
   अब देखिये 2025 में प्रयागराज में महाकुम्भ हो रहा है केवल नाम बदला तो लोग इस नाम से स्वयं को ज्यादा कनेक्ट कर रहे हैं सरकार इस नाम से कुम्भ की ब्रांडिंग कर रही है। सरकार का इस आयोजन पर 6000 करोड़ का बजट है और रेवेन्यू आने की संभावना है लगभग 4 लाख करोड़ का अब अगर इस पर 10 प्रतिशत टैक्स मान लिया जाए तो सरकार के खाते में लगभग 40 हजार करोड़ आएंगे... यह है धर्म की ब्रांडिंग से उपजा रोजगार 
यह पैसा कहाँ खर्च होगा??
जाहिर है ना साधु संत इसे अपनी पोटली में ले जाएंगे और ना अखाड़े वाले ले जायेंगे। यह पैसा भी सरकार ही खर्च करेगी, सड़क बनाने में, स्कूल कॉलेज बनाने में,बिजली पानी की सब्सिडी में, मुफ्त राशन देने में,किसानों को सब्सिडी देने में.... लोगों को सस्ते लोन देने में. तो आप बताइये कि 40000 करोड़ का टैक्स कौन सी इंडस्ट्री देती है डेढ़ महीने में??
      यही है सनातन अर्थशास्त्र। पर एक वर्ग चाहता है कि केवल भोग विलास में लोग अपना जीवन जियें, इसी भोग विलास की चीज़ों के निर्माण हेतु फैक्ट्री और कारखाने विकसित हों, इसी भोग विलास को लोग जीवन का उद्देश्य समझें और सम्पूर्ण राष्ट्र भोग विलास की अर्थव्यवस्था अपनाये... और जैसे ही उन्हें धर्म का प्रचार प्रसार होता दिखता है वह आक्रोशित हो उठते हैं, धर्म और धार्मिक क्रियाकलापों पर प्रश्न खड़े करने लगते हैं और धर्म पर अभद्र टीका टिप्पड़ी करने लगते हैं जबकि हो सकता है वह भी इसी धर्म आधारित अर्थव्यवस्था से कमा भी रहे हों।  ईश्वर ऐसे सभी अधार्मिक लोगों को सदबुद्धि दें।
अवनीन्द्र सिंह जादौन 
शिक्षक लेखक एवं ब्लॉगर 

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