कोटा में हर वर्ष कई बच्चे परीक्षा में असफलता के दबाब में आत्महत्या कर लेते हैं तो समाधान निकाला गया कि कमरों में लगे पंखो को जाली से कवर कर दो ताकि वह पंखे में रस्सी बांधकर न लटक सकें या पंखो के लटकाने वाले हुक को स्प्रिंग का बना दो ताकि वह जब लटकें तो स्प्रिंग लम्बी होकर जमीन तक आ जाये।
क्या वास्तव में यह आत्महत्या रोकने का कारगर उपाय है? जो अत्यधिक डिप्रेशन में है और जो मरने का मन बना चुका है क्या वह मरने का कोई और रास्ता नहीं खोज लेगा?
भगवान न करें कि किसी माता पिता का बच्चा परीक्षा में असफलता या असफलता के डर से आत्महत्या करे पर अपनी सफलता के लिए जीतोड़ मेहनत करने बाले जूनूनी और संवेदनशील बच्चों में से कई के मन में इस तरह के भयावह विचार कभी कभी आ ही जाते हैं और जिन्हें अपने माता पिता की डांट या दोस्तों के कमेंट को झेलने का साहस नहीं होता हैं वह खुद पर नियंत्रण खोकर कई बार आत्महत्या जैसे निर्णय भी ले लेते हैं।
वास्तव में हम समस्याओं का मूल कारण खोजना ही नहीं चाहते है हम तो तात्कालिक कारणों और उपायों पर समय और पैसा बर्बाद करते हैं। हम नहीं जानना चाहते है कि बच्चे इतने तनाव में क्यों है? हम उन्हें नहीं समझाना चाहते है कि यह परीक्षा ही जीवन की अंतिम परीक्षा नहीं है, हम उन्हें नहीं बता पाते की प्रतियोगी परीक्षा में सफलता से अधिक जरूरी हमारे लिए हमारे बेटा/बेटी का जीवन है, हम उन्हें नहीं समझा पाते हैं कि जीवन में पैसा कमाने के लिए और भी काम धंधे है जिन्हें करके सम्मानजनक सुखी जीवन जिया जा सकता है, हम स्वयं बच्चों पर अपनी उम्मीदों अपने सपनों का इतना बोझ लाद देते है कि बच्चा असफलता के डर से विचलित और बेचैन हो जाता है और पेपर ख़राब होते ही डिप्रेसन में आकर आत्मघाती कदम उठाने के विचार उनके मन में आने लगते हैं।
ज्यादातर लोग बच्चों के बोर्ड पेपर के पहले कहते हैं कि खूब अच्छे से पेपर करके आना और पेपर के बाद डांटते नजर आते है कि जब मेहनत नहीं करोगे तो प्रश्न तो छूट ही जायेंगे । हम उन्हें पेपर से पहले क्यों नहीं समझाते कि तुमने साल भर ईमानदारी से मेहनत की है अब पेपर कैसा भी जाए, परिणाम कुछ भी आये चिंता मत करना। हम उन्हें इस बात के लिए क्यों आश्वासन नहीं देते कि परिणाम ख़राब आएगा तो भी कोई बात नहीं हम एक बार फिर कोशिश करेंगे, हम उन्हें क्यों नहीं हिम्मत देते कि सिलेक्शन नहीं भी होगा तो भी अगर तुमने ईमानदारी से पढ़ाई की है तो वह मेहनत जीवन में बेकार नहीं जाएगी और तुम कुछ न कुछ अच्छा जरुर कर लोगे ऐसा मुझे भरोसा है।
भारत में निम्न मध्यम वर्ग के मेधावी बच्चों के सामने अपने परिवार को गरीबी से निकालकर अच्छा आर्थिक जीवन देने का दबाब बचपन से ही उनके माता पिता उन पर डाल देते है उनके लालन पालन में आर्थिक संसाधनों की कमी और माता पिता के ताने उन्हें सफलता के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना देते हैं और यही दबाब, तनाव और संवेदनशीलता कभी कभी उनके लिए आत्मघाती हो जाती है।
सामान्य आर्थिक वर्ग के अभिभावक स्वयं इस बात को स्वीकार ही नहीं कर पाते कि मेडिकल और इंजीनियरिंग में सफल न होने पर भी उनका बच्चा मेहनत करके अच्छा जीवन जी सकता है और जब वह स्वयं यह स्वीकार नहीं कर पाते है तो निश्चित ही वह बच्चों को भी यह स्वीकार नहीं करने देते है। उन्हें स्वयं ही यह नहीं पता होता है कि आर्ट, कॉमर्स, लॉ, मैनेजमेंट एग्रीकल्चर और अन्य कई विषय और स्पेशल डिप्लोमा के छात्र भी लाखों के पैकेज की नौकरी कर सकते है इसलिए जरुरत है कक्षा 10 के परीक्षा परिणाम के साथ ही अभिभावकों की मनोवैज्ञानिक कॉउंसलिंग हो ताकि वह आगे छात्रों की पढ़ाई के दौरान उनका मनोवैज्ञानिक सपोर्ट कर सकें, समय से अपने छात्रों के गुणों को पहचान कर उसे सही विषय और सही रास्ता चुनने में मदद कर सकें।
आत्महत्या करने के लिए पंखे की देखरेख करने या बच्चों को आत्महत्या से बचाये रखने की निगरानी के जगह आत्महत्या की मनोवृत्ती के कारणों पर काम करने की जरुरत है बचपन से ही बच्चों को पढ़ाई में ईमानदारी से मेहनत करने की आदत के साथ, योग, प्राणायाम, कल्चरल एक्टिविटी, सामुदायिक सहभागिता, नैतिक शिक्षा, खेल कूद के द्वारा उनके सर्वांगीण विकास की जरुरत है एक बार अगर आपका बच्चा अच्छे मानवीय गुणों के साथ ईमानदारी से मेहनत करना सीख गया तो वह जीवन में कभी भी भूखा नहीं मरेगा वह कठिन स्थितियों और असफलता में धैर्य नहीं खोयेगा वह सफलता में अभिमानी और दम्भी नहीं बनेगा इसलिए आप पहले उसे एक मजबूत इंसान बनाये सफलता तो वह अपने आप हांसिल कर ही लेगा।
अवनीन्द्र सिंह जादौन
अध्यापक
संयोजक मिशन शिक्षण संवाद उत्तर प्रदेश
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