विगत दिनों उत्तर प्रदेश में नीट की तैयारी कर रहे एक 17 वर्षीय छात्र ने आत्महत्या कर ली थी ऐसी घटना कोई पहली बार नहीं हुई है कोटा में तो हर वर्ष प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे सैकड़ो छात्र परीक्षा के तनाव दबाब और अवसाद से ग्रसित होकर आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं। केवल प्रतियोगी परीक्षा में शामिल हो रहे किशोर ही नहीं बल्कि शादीशुदा नवयुवा भी अक्सर जीवन की छोटी मोटी चुनौतियों से घबराकर आत्महत्या जैसा कदम उठाकर अपना जीवन दांव पर लगा लेते है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है इस पर न तो कोई चर्चा होती है और न ही कोई सेमिनार। जिस परिवार का किशोर या युवा जाता है उनके सामने दुःखों को बर्दाश्त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है।
शहरी क्षेत्रों में आज के बच्चे अपने लक्ष्यों के प्रति बड़े क्रेजी होते हैं छोटे छोटे बच्चे अपने ड्रेसिंग सेंस और लाइफस्टाइल को लेकर काफी जागरूक हैं। 6 साल के बच्चों की भी पसंद और ना पसंद होती है क्योंकि हमने बचपन से ही उन्हें सलीके से पहनने ओढ़ने की सलाह दी है। आजकल बच्चों के शैक्षिक लक्ष्यों का निर्धारण उनके माता पिता करते हैं ऐसे में वह बच्चे के जन्म से ही उसकी सफलताओं का समुचित प्रबंधन करना शुरू कर देते हैं। किस स्कूल में नाम लिखाना है की चिंता के साथ ही भविष्य में किन विषयों के साथ किस स्ट्रीम से कौन सा कैरियर बनाना है इसकी चिंता करते हुए हरवर्ष लाखों नौजवान अपने कस्बों से शहरों में शिफ्ट हो जाते हैं। वहीं 20 साल पहले बच्चों की खातिर शहरों में आये लोगों के पुत्र पुत्रियां दिल्ली कोटा मुम्बई बैंगलोर जैसे शहरों में उच्च शिक्षा के लिए शिफ्ट कर दिए जाते हैं। जिनमें से कुछ प्रतिशत को अपना लक्ष्य प्राप्त होता है शेष असफल हो जाते हैं और उनमें सैकड़ो जीवन से निराश होकर प्रतिवर्ष आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं।
वास्तव में बहुत से अभिभावक अपने बच्चों को केवल जीतते देखना चाहते हैं वह नर्सरी जैसी कक्षाओं से ही बच्चों को कक्षा में अव्वल आने के लिए प्रोत्साहित करना शुरू कर देते हैं बच्चों के जीतने पर उन्हें पुरस्कार दिया जाता है आए हारने पर उन्हें डांट कर गुस्से का इजहार किया जाता है। छोटी उम्र में ही बच्चे जानने लगते हैं कि कक्षा में प्रथम आना सामाजिक और आर्थिक रूप से लाभदायक है और हर बार अब्बल आने पर मन की कोई मुराद पूरी होने के साथ स्कूल में उसके प्रति अध्यापकों का सम्मान भी बढ़ता है। किसी भी शहर के हजारों कान्वेंट के प्रथम आये छात्र कक्षा 10 में एक साथ बोर्ड परीक्षा में शामिल होते हैं ऐसे में जनपद के श्रेष्ठ 10 में शामिल होने का अत्यधिक मानसिक दबाब इन बच्चों पर होता है यहाँ अभिभावक भी उनके दबाब को कम करने की जगह अपनी अपेक्षाओं का बोझ लादकर उन्हें अत्यधिक तनावग्रस्त कर देते हैं। 10th बोर्ड के परिणाम को 12th में दोहराने का दबाब उनके ऊपर रहता है जबकि 10th से 12th में 3 गुणा अधिक पाठ्यक्रम होता है। इसके बाद प्रत्येक जिले के ये टॉप रैंकर छात्र एक साथ नीट और आई आई टी में सम्मिलित होते हैं तो शीर्ष 5 हजार में आकर टॉप स्कूल लेने का ख्वाब उन्हें दिन और रात बेचैन करता है आई आई टी की प्रारंभिक परीक्षा में पास लगभग 2.5 लाख छात्रों में मात्र 5 हजार ही आई आई टी संस्थानों में अच्छी ब्रांच पाते हैं। हर बार जीतते रहने बाला छात्र कैसे स्वयं को हार जाता देखे.... उसे तो सदैव जीतने के बाद का जश्न याद रहता है इसलिए 12 साल लगातार जीतने की कल्पना करने बाला छात्र अंतिम 5 हजार की दौड़ से स्वयं को बाहर होता देख इतना असहज हो जाता है कि उसे अपना कैरियर और दुनियाँ खत्म होने की कल्पना होने लगती है और ऐसे बहुतेरे छात्र स्वयं और माता पिता के सपनों के पूरा न हो पाने का डर वर्दाश्त नहीं कर पाते है और तनाव, निराशा, डर में कई बार जीवन समाप्त कर लेने जैसा जोखिम ले लेते हैं।
वास्तव में बच्चों की आत्महत्या के पीछे कहीं न कहीं अभिभावक की सोच ही जिम्मेदार होती है अभिभावक बच्चों की क्षमता का वास्तविक आंकलन किये बिना केवल बड़े स्कूल के नाम पर ही सुनहरे कैरियर के सपने देख लेता है और उन्हें बच्चों के माध्यम से पूरा करने का प्रयास शुरू कर देता है अभिभावक बच्चों को जीवन कौशल अर्जित करने की जगह केवल कक्षा में अधिकतम शैक्षणिक अंकों को लाकर शीर्ष स्थान हाँसिल करने का सपना दिखाते है, उन्हें औसत छात्रों की सफलता की कहानियाँ सुनाने की जगह समाज के अत्यंत मेधावी और सफल छात्रों का उदाहरण देकर उनके जैसा बनने का मानसिक दबाब बना देते हैं। अभिभावक बच्चों को गिरकर उठ खड़े होने की सीख की जगह सदैव शीर्ष पर बने रहने को प्रोत्साहित करते हैं। अभिभावक बच्चों को किसी भी ऐसी प्रतियोगिता में भाग नहीं लेने देते जहाँ उसके हारने के खतरा हो क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनका मनोवल टूटेगा जबकि जीवन मे कई बार हारना बच्चे को मनोवैज्ञानिक रूप से ऐसी हार को बर्दाश्त करके उन्हें पहले से अधिक मजबूत बनाता है। बच्चों के खेल में हारने पर उन्हें प्रोत्साहित करने पर वह पुनः कोशिश करना सीखते हैं और हार के भय, डर और आलोचना से भी स्वयं को मैनेज करना सीखते हैं इसीलिए स्कूली शिक्षा में पढ़ाई के साथ कई तरह की गतिविधियों के माध्यम से बच्चों को जीतना हराना और एक दूसरे का सहयोग करना सिखाया जाता है।
ज्यादातर अभिभावक कक्षा 7-8 से ही बच्चों को पाठ्येत्तर और खेलकूद की गतिविधियों से दूर कर देते हैं जिससे बच्चा मनोवैज्ञानिक रूप से एकाकी होकर केवल शैक्षणिक रूप से शीर्ष रहने का प्रयास करना शुरू कर देता है, उसके मन में हारने के बाद के परिणामो को लेकर काफी तनाव होता है क्योंकि हराने बाले कार्यो से वह स्वयं को दूर कर चुका है और शायद यही कारण है कि कोई भी मेधावी छात्र हराने पर या हराने की संभावना से इतना विचलित हो जाता है कि उसे जीवन मे सफलता का कोई अन्य रास्ता दिखना बंद हो जाता है।
अभिभावकों को जिम्मेदारी है कि बच्चों को जीतने और हारने में बैलेंस करना सिखाये उन्हें बचपन से ही ऐसे कार्यों में भी शामिल करें जिसमे वह कभी कभार हारता भी रहे ताकि एकदम हारने पर धैर्य न खो दे। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों के साथ प्रतिदिन बात कर उन्हें परिणाम की जगह केवल ईमानदारी से मेहनत करने के लिए प्रेरित करें और परिणाम खराब होने पर पुनः प्रयास में सहयोग का आश्वासन दे दें। अभिभावक औसत श्रेणी के लोगों द्वारा अर्जित सफलताओं की कहानियों द्वारा उनका मनोवल बढ़ाये साथ ही शिक्षा में असफल छात्रों द्वारा किये गए अनुकरणीय और अदभुद कार्यो द्वारा अर्जित सफलता की कहानियाँ बताकर उनके दिमाग का प्रेशर कम करते रहें। अभिभावक उन्हें बताएं कि किसी परीक्षा की सफलता के बाद अच्छी नौकर से भी अधिक जरूरी है जीवन मे एक ईमानदार सफल और लोकप्रिय इन्सान बनना, अभिभावक कोशिश करें कि बच्चों को कोटा इंदौर जैसे शहरों में अकेले छोड़ने की जगह उनके साथ परिवार का कोई सदस्य जरूर रहे जो प्रतिदिन उन्हें भावात्मक सपोर्ट दे सके। अभिभावक बच्चों को बताएं कि प्रारंभिक परीक्षा में पास 2.5 लाख छात्रों में से 5 हजार तो श्रेष्ठ हैं पर जीवन मे इन 5 हजार के अलावा बचे छात्रों ने भी सफलता के इतिहास बनाये हैं और कई बार तो आई आई टी में चयनित छात्रों से भी अधिक अच्छी नौकरी हाँसिल की है। अभिभावक बच्चों को समझाएं की पूर्ण क्षमता और ईमानदारी से मेहनत के बाद भी अगर आपको अपेक्षित परिणाम नहीं मिलता है तो अन्य क्षेत्रों में जाकर भी बड़ी सफलता हाँसिल की जा सकती है उन्हें बताएं कि हराना जीवन का अंग है और इसे ईमानदारी से स्वीकार कर निराश होने की बजाय और अधिक मेहनत करने से निश्चित ही लक्ष्य मिलते हैं।
अवनीन्द्र सिंह जादौन
शिक्षक एवं ब्लॉगर
संयोजक मिशन शिक्षण संवाद
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