हिन्दू धर्म में कोई भी कर्म गैर वैज्ञानिक एवं गैर व्यवहारिक नहीं है क्योंकि हिन्दू धर्म के साथ एक श्रेष्ठ जीवन पद्यति है। हिंदुओ में व्यक्ति की मृत्यु से जुड़े संस्कारो का बड़ा सामाजिक महत्व है।
1. नदियों के किनारे दाह संस्कार
हिंदुओ में पवित्र नदियों के किनारे दाह संस्कार करने के पीछे भावात्मक और धार्मिक मान्यता तो है ही पर यह वैज्ञानिक भी है। वैज्ञानिकों के अनुसार शरीर के जलने के बाद जो राख बचती है वह एक सर्वश्रेष्ठ खाद है जिसे बोनमील खाद कहते हैं। जिसे दाह संस्कार के बाद पवित्र नदियों में प्रवाहित करने का रिवाज है जिससे यह नदी के जल के साथ खेतों तक पहुचकर खेत को उपजाऊ बनाती है। आप सभी जानते हैं कि गंगा नदी भारत मे सबसे अधिक दूरी तय करती है साथ ही सबसे अधिक पवित्र भी मानी जाती है इसलिए गंगा नदी के किनारे अंतिम संस्कार करने की प्रथा हमारे धर्म में चलन में है। अंतिम संस्कार के बाद बची राख को उसी नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है जिसमे कैल्शियम सल्फर जैसें मिनरल होते हैं। इस रिवाज के चलते यह खाद प्रचुर मात्रा में खेतों तक पहुंच जाती है। जिन स्थानों के आसपास नदियां नहीं होती थी वहाँ अंतिम संस्कार के बाद अस्थियाँ संगम या गंगा में विसर्जित करने की प्रथाएं प्रचलित हैं।
2.अंतिम संस्कार के बाद बाल कटवाने का रिवाज है।
आज से दो चार पीढ़ी पूर्व अंतिम संस्कार में शामिल सभी व्यक्ति वहीं अपना मुंडन करवाते थे धीरे धीरे यह परिवार और अंत मे केवल दाह संस्कार करने बाले व्यक्ति तक सिमटता नजर आ रहा है। मुंडन संस्कार पर जानकारों का तर्क यह है कि वहां जाने पर दाह संस्कार में उडी राख बालों में जम जाती थी जिसको मुंडन द्वारा साफ कर दिया जाता था क्योंकि बालों के अंदर जमा गंदगी आसानी से साफ नहीं होती है और पुराने समय मे साबुन तथा शैम्पू नहीं होते थे। जानकर यह भी मानते हैं कि कई बुजुर्ग अंतिम समय मे बीमारियों से जूझते हुए प्राण त्यागते थे ऐसे में उनके दाह के समय शरीर के बैक्टिरिया हवा में उड़ते हुए शरीर और बालों से चिपक जाते थे इसलिए दाह संस्कार की प्रक्रिया रोग का कारण बन सकती थी जिससे बचने के लिए मुंडन किया जाता था। सभी लोग अंत में मृतक के दरवाजे जाकर नीम को चवाकर विदा लेते थे जिससे मुख के बैक्टीरिया भी समाप्त हो जाते थे। वर्तमान कोरोना ने सेनिटाइजर का उपयोग सिखाया है तो नीम की पत्ती के उपयोग की महत्ता आपको समझ आनी चाहिए। साथ ही एक परिवार के सभी लोगों के मुंडन हो जाने से एक पहिचान स्थापित होती थी और लोग तेरहवी तक मृतक के परिजनों से हास परिहास नहीं करते थे। साथ ही बाजार इत्यादि में निकलने पर लोगों को अंदाज लग जाता था कि इस व्यक्ति के घर किसी की मृत्यु हुई है तो वह रोककर संवेदना व्यक्त कर देता था।
3.मृतक के घर भोजन पहुंचाने का रिवाज
चूंकि प्राचीन समय गांव में बाजार उपलब्ध नहीं होते थे और अगर होते भी थे तो साप्ताहिक रूप से लगते थे ऐसे में उसी दिन दाह संस्कार में शामिल होने बाले परिजन और रिश्तेदारों के लिए भोजन सामिग्री की व्यवस्था लगभग असंभव थी साथ ही परिवार के लोग भी गमगीन होते हैं और सभी आगंतुक रिश्तेदारों के लिए घर की गमगीन बहुओं के लिए भोजन बनाना कठिन होता था यह बात सभी ग्राम के लोग समझते थे इसलिए प्रत्येक घर से पूड़ी और सब्जी उस घर भेज दी जाती थी यह क्रम लगभग शुद्धिकरण तक चलता था तब तक घर के लोग बाजार से सामान क्रय करके तेरहवीं इत्यादि की व्यवस्था कर लेते थे। वर्तमान में भी यह प्रथा कुछ लोग निभाते हैं।
3.मुखाग्नि देने के बाले व्यक्ति को अलग रखना
मुखाग्नि देने बाले व्यक्ति को अलग चारपाई दे दी जाती है और वह घर के द्वार पर ही रहता है उसके साथ कुछ चीज़े भी रखी जाती हैं तेरहवीं तक वह व्यक्ति अपना द्वार छोड़कर कहीं नहीं जाता है। इसका एक कारण वायरस इत्यादि के कारण आइसोलेशन था ताकि घाट में बॉडी से आये वायरस बच्चों को संक्रमित न करें साथ ही मृतक के जानने बाले व्यक्ति उसके परिजनों से मिलकर शोक संवेदना व्यक्त करते है ऐसे में वह व्यक्ति सके मिलने जुलने बाले परिचित, व्यवहारी और रिश्तेदार लोग घर आकर उनसे मिलने पर 13 दिन लगातार उपलब्ध रहता था और सबको अटेंड कर लेता था कई बार पिता के दोस्त उनके पुत्रो को नहीं पहचानते हैं पर मृतक के घर पहुँचते ही अलग चारपाई पर एक लोटा कुल्हाड़ी आदि के साथ आसीन सिर मुड़वाये व्यक्ति को देखकर अंदाज लगा लिया जाता है कि इसी व्यक्ति ने अंतिम संस्कार के दायित्व को पूरा किया है और यही उस मृतक का उत्तराधिकारी है इस तरह लोग मृतक के उत्तराधिकारी से परिचित हो जाते हैंं शेष अपरिचित लोग उस व्यक्ति की तेरहवीं में आकर उससे परिचय प्राप्त करते थे और एक सामजिक परम्परा से एक व्यक्ति मात्र 13 दिन में ही अपने पिता द्वारा जुटाए सामाजिक संपत्ति का उत्तराधिकार प्राप्त कर लेता है लोगों को अब पता रहता था कि मृतक के परिवार से सभी प्रकार के सामाजिक संबंधो का निर्वाह इस व्यक्ति के साथ करना है। स्त्रियों की मृत्यु पर उनके पति से मिलकर सांत्वना प्रदान कर देते थे।
4.मृत्यु भोज
वास्तव में प्रचीन समय मे मृत्यु भोज अर्थात तेरहवीं तेरह ब्राम्हण, घर परिवार और बाहर से आकर रुके रिश्तेदारों (आवागमन के सीमित साधन के कारण) तक सीमित थी इसमे शुद्धिकरण तक नियमित भोजन भेजने बाले अड़ोसी पड़ोसी भी शामिल करना तार्किक बात थी फिर इसमें गांव के सुधीजनों और व्यापार इत्यादि के रूप में जुड़े और शोक व्यक्त करने आए लोगों को शामिल किया जाने लगा। अलग अलग अलग जगहों से रिश्तेदार और सुधीजन प्रतिदिन 8-10 की संख्या में आकर मिलने और वापसी के साधन न होने से रुकने की दशा में उनके भोजन इत्यादि की व्यवस्था कठिन हो सकती थी (उस समय आवागमन के साधन और मार्ग अच्छे नहीं होते थे) इसके लिए सबको बुलाकर भोजन कराने की व्यवस्था की गई और इसके लिए एक तिथि निर्धारित होती है ( यह व्यवस्था अन्य धर्मों में भी है) हालांकि अब तेरहवीं प्रदर्शन का विषय बनता जा रहा है तेरहवीं में आमंत्रण संख्या को लोग प्रतिष्ठा और व्यवहार से जोड़कर देखने लगे जिससे यह प्रथा विकृत होने लगी। कुुुछ समय बाद नेताओ और जनप्रतिनिधि को जबदस्ती बुलाने की होड़ हो उठी फिर हजारों लोगों को भोजन पर बुलाकर रसूख बनाने और दिखाने की प्रथा शुरू हो गयी। गरीबों ने अमीरों की देखादेखी जमीन बेंचकर और कर्जा लेकर मृत्यु भोज करना शुरू कर दिए। ऐसे अनुचित प्रयासों और दिखावा को हतोत्साहित किया जाना चाहिए। किसी भी व्यक्ति को दिखावे के लिए कोई ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिससे उस पर कर्जा हो जाये और अन्य लोग उसके कार्यो से प्रभावित हों।
आज की युवा पीढ़ी बिना कुछ जाने धीरे धीरे अपनी मान्यताओं से विमुख हो रही है शहरी क्षेत्र के माता पिता अपने निजी खर्च काटकर अपने बेटों के हर वर्ष जन्मदिन मनाते हैं और उन्हें गिफ्ट देते हैं अधिकांशतः उनके सक्षम बेटे ही अंतिम समय के संस्कारों को गैर जरूरी मानकर उनका विरोध करते हैं जबकि ग्रामीण क्षेत्र के लोग आज भी इन परंपराओं का निर्वहन करते हैं।
अवनीन्द्र सिंह जादौन
लेखक एवं ब्लॉगर


बहुत अच्छा लेख. परम्परा का वैज्ञानिक और सामाजिक विश्लेषण .....
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