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दिये वाली

दिए वाली सड़क के किनारे बैठी उस 9-10साल की लड़की पर मेरी निगाह जैसे ही पडी बह जोर से बोली आइये बाबु जी दिए ले लीजिये, मोमबत्ती ले लीजिये ।पर मेरे पूरे घर में बल्ब की झालर लगती है इसलिए मैं खरीदने के मूड में नहीं था और उसकी बात को अनसुना कर जैसे ही पैर बढाया बह फिर बोली "ले लीजिये बाबू जी" अबकी बार उसके स्वर में याचना थी। पर तब तक मेरी निगाह बगल से लगी झालरो की एक बड़ी दुकान पर चली गयी मैंने दुकानदार से झालर का दाम पुछा इस से पहले बह कुछ जबाब देता पीछे से उस लड़की की आवाज फिर से आयी "ले लीजिये बाबू जी आपका कुछ नहीं बिगड़ेगा पर मेरी दीवाली मन जायेगी" इस बार उसके स्वर में हताशा और निराशा थी ।मुझे पता था की इन दियो की मुझे कोई आवस्यकता नहीं है पर उसकी बात मुझे छू गयी थी इसलिए मैंने पलट कर पूछा "कितने के है" इतनी सी बात पर उस लड़की में पता नहीं कितनी ऊर्जा आ गयी और लगा जैसे नया जीवन मिल गया हो " 10रुपये के 25 है आपको  30 दे दूँगी , थोड़े से बचे है आप  सब ले लो  ,मैं भी घर जाकर त्यौहार की तैयारी करू ," एक ही साँस में उसने अपनी बात कह डाली ।  मैं तो एक टक उसकी खुशी को निहार रहा था जब मैंने कोई जबाब नहीं दिया तो उसने फिर पूछा " कितने दे दूं साहब" पर मुझे अपनी तरफ देखते वो झेप सी गयी ,भेष से वो  जरूर ग्रामीण लग रही थी पर नाक नक्श और व्यवहार पढ़े लिखे सभ्य  सहरी लोगो जैसा था ।मैंने पूछा " स्कूल नहीं जाती?" तो वो चहककर वोली " जाती हूँ साहब  गाँव के प्राइमरी मेंपर अभी त्यौहार है सो......"कहकर वो चुप हो गयी सायद उसको कुछ अपराध बोध सा था इसलिए नजरें झुकाकर बोली "कितनी दे दूं " "कितनी बची हैं " मैंने पूछा ।वो वोली 130 "कितने रुपये हुए " मैंने फिर पुछा ,उसने अपनी अंगुलियो पर हिसाब लगाया और वोली "40 रुपये दे दो और 10 दिए फ्री ले जाओ" मैंने मन में सोचा है तो होशियार फिर 50 का नोट उसे दिया उसने 10रुपये बापस किये तो मैंने कहा रख लो पर वो तुनककर वोली  "नहीं नहीं साहब माँ कहती है की भीख नहीं लेनी चाहिए "मुझे अपने पर शर्म आयी और मैंने पैसे वापस ले लिएजब तक वो दिए पैक करे मैंने पुछा " माँ क्या करती है " माँ तो भगवान के घर चली गयी पिछले साल ,मेरा छोटा भाई पटाखे के लिए बापू से जिद करने लगा पर बापू के पास पैसे नहीं थे क्यूंकि वो सब माँ के इलाज में लग गए सो बापू ने उसकी पिटाई कर दी इसलिए मैंने सोचा की दिए बेचकर कुछ पैसे मिल जायेगे तो  मैं अपने छोटू के साथ दिवाली मना लूगी वो छोटा है तो समझता नहीं है ,ये लीजिये आपके दिए " मैं सन्न रह गया उसकी बात सुनकर ,थैली हाथ में पकड़ते हुए मैंने पुछा" क्या नाम है तुम्हारा" वो हँसते हुए वोली "दिए वाली" मैंने बजार से कुछ और खरीददारी की पर मेरा मन नहीं लगा ।दिए घर लाकर दिए तो पत्नी झल्लाकर बढ़बढ़ाने लगी "ये क्या है, फ्री बिक रहे थे क्या , अब 1लीटर तेल कहाँ से आएगा ? बत्त्तियां अलग से बनाओ ,वेवजह परेशानी बढ़ाते रहते हो क्यूँ आता है यह त्यौहार " मैंने धीरे से कहा "दिए वाली के लिए ही आता है ये त्यौहार" और बोझिल मन लिए लेट गया विस्तर पर जाकर ।आज 20 साल बाद भी जब दीवाली आती है तो मेरी नजरे बाजार में उस दिए बाली को ही खोजती ह

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